स्वराज से सुराज का अमृत महोत्सव
जयपुर: सुशासन, नेतृत्व, कर्तव्य परायणता और आत्मबल को श्रीमद्भगवद्गीता कई प्रकार से संदर्भित करती है जिनकी आधुनिक संदर्भ में पुनः व्याख्या की जा भी रही है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य के कार्यों में लोगों के कल्याण को सर्वोपरि माना गया। महात्मा गांधी ने सुराज पर जोर दिया जिसका अनिवार्य रूप से मतलब सु-षासन ही…
