स्वराज्य के स्वप्न को साकार करने वाले ‘समर्थ गुरू’ का अमृत महोत्सव

- समर्थ गुरू रामदास नवमी पर विशेष

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स्वराज्य

1916 में बाल गंगाधर तिलक के लोकप्रिय नारे “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा” और भारतीय नेशनल कांग्रेस के 26 जनवरी 1930 की पूर्ण स्वराज्य की मांग से 300 वर्ष पहले एक स्वामी जिन्हें हम शिवाजी मराठा के गुरू स्वामी रामदास के नाम से जानते हैं ने न केवल हिन्दवी स्वराज्य का स्वप्न देखा अपितु उसे छत्रपति शिवाजी के माध्यम से पूर्ण होते भी देखा। आज उसी समर्थ गुरू रामदास का अवतरण दिवस है जिन्हें ब्रह्मसत्ता और राजसत्ता के संगम के लिए जाना जाता है और उन्हें प्रेरणा मिली सिक्खों के छठे गुरू हरगोविन्द से।

इतिहासकारों के अनुसार गढ़वाल श्रीनगर के आस-पास इन दोनों सन्तों का मिलन हुआ। सच्ची पातशाही छठवें नानक गुरू हरगोविन्द को घोड़े पर सवार और दो तलवारें लटकाये देखकर आश्चर्यचकित हुए रामदास जी गुरू हरगोविन्द से प्रश्न कर बैठे, ‘‘गुरू नानक एक त्यागी साधु से जिन्होंने संसार को त्याग दिया था, आप हथियारों से सुसज्जित हैं, सेना और घोड़े रख रहे हैं और अपने आप को सच्चा पातशाह, सच्चे राजा के रूप में संबोधित करने की अनुमति देते हैं, आप किस प्रकार के साधू हैं? मराठा सन्त के इस अनायास प्रश्न के उत्तर में गुरू हरगोविन्द सिंह ने कहा, “आन्तरिक रूप से एक साधु और बाह्न रूप से एक राजकुमार।” मेरी दो तलवारों से अभिप्राय है मिरी (सांसारिक) और पीरी (आध्यात्मिक) यानि मिरी-पीरी का सहयोग ही गरीबों की सुरक्षा, अत्याचारी का विनाश कर सकता है। बाबा नानक ने संसार का त्याग नहीं बल्कि माया अर्थात् स्वयं और अहंकार का त्याग किया था।

गुरू हरगोविन्द के इन शब्दों को रामदास के दिल में एक तैयार प्रतिक्रिया मिली जिन्होंने ‘‘पोथी पंजा साखियाँ’’ में उद्धृत किया। उन्होंने सहज रूप से कहा था, ‘‘यह मेरे दिमाग को भाता है यानि यह हमारे मन भावती है’’ उन्होंने गुरू के शब्दों मेें अपनी आंतरिक आत्मा की अभिव्यक्ति को पाया। इस ऐतिहासिक मिलन ने समर्थ रामदास पर प्रभाव छोड़ा और उन्हें दमनकारी, अन्यायकारी, अत्याचारी शासन के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया होगा। अपने बाद के वर्षों में उन्होंने व्यायाम और शारीरिक प्रशिक्षण पर जोर दिया और समाज में योद्धा की भूमिका पर प्रकाश डाला और गांव-गांव, कस्बे-कस्बे हनुमान जी के मन्दिरों की स्थापना की और उन्हें एकजुट होकर दुश्मन से लड़ने की शिक्षा दी।

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कहते हैं शिवाजी ने उन्हें एक दिन कहा कि आपके सभी शिष्य तो राम का जाप कर मजे में रहते हैं और मैं राज्य के काम-काज में उलझ कर तंग आ गया हूं ये पकड़ो मेरा मुकुट, मेरी तलवार और संभालो अपना राज्य यानि शिवाजी महाभारत के अर्जुन की स्थिति में आ गए जो अपने कर्त्तव्य से विमूढ़ हुआ अपना गांडीव त्याग युद्ध के मैदान से भाग जाने को आतुर था। समर्थ गुरू ने कृष्ण की भांति शिवाजी से कहा, ‘‘चल राज्य तो मेरा हुआ तू ऐसा कर मेरे यहां नौकरी कर ले। समर्थ गुरू ने कहा, ‘‘ठीक है, बता तू क्या नौकरी करेगा तो शिवाजी का स्वाभाविक उत्तर था मैं तो योद्धा हूं उसी नौकरी को कर सकता हूं तो समर्थ ने कहा, ‘‘ठीक है मैं राजा और तू मेरा योद्धा’। यानि शिवा को कर्त्तापन के भाव से मुक्त कर दिया और कहते हैं शिवाजी ने इस भाव से कभी कोई युद्ध नहीं हारा और गुरू के स्वराज्य स्थापना के स्वप्न को पूरा किया।

गांधी जी ने कहा, ‘‘स्वराज का अर्थ है-जन प्रतिनिधियों द्वारा संचालित ऐसी व्यवस्था जो जन आवश्यकताओं और जन आकांक्षाओं के अनुरूप हो। गांधी जी के स्वराज्य की अवधारणा अत्यन्त व्यापक है। स्वराज का अर्थ केवल राजनैतिक स्तर पर विदेशी शासन से स्वाधीनता प्राप्त करना नहीं है बल्कि इसमें सांस्कृतिक व नैतिक स्वाधीनता का विचार भी निहित है। यह राष्ट्र निर्माण में परस्पर सहयोग व मेल मिलाप पर बल देता है और शासन के स्तर पर यह सच्चे लोकतन्त्र का पर्याय है। इसमें गांधी का सर्वोदय और पण्डित दीनदयाल का अंत्योदय भी सम्मिलित है। वर्तमान समय में सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास नारे यदि वास्तविकता में तबदील होते हैंं तो वही स्वतन्त्रता के अमृत महोत्सव में सच्ची पातशाही और समर्थ गुरू रामदास को भावांजलि और श्रद्धांजलि होगी। जय-जय रघुबीर समर्थ, शिवा को दीओ स्वराज का अर्थ, ऋणी रहेगा भारतवर्ष, जय-जय रघुबीर समर्थ।

- डॉ. मार्कन्डेय आहूजा कुलपति, गुरूग्राम विश्वविद्यालय, गुरूग्राम
– डॉ. मार्कन्डेय आहूजा, कुलपति, गुरूग्राम विश्वविद्यालय, गुरूग्राम

 

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