सान्याल बंधुओं के राष्ट्रवाद का अमृत महोत्सव

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सान्याल बंधु

इतिहास साक्षी है चार साहिबज़ादों के बलिदान की कहानी का और इनकी शहादत पर इनके पिता दशम गुरु गोविन्द सिंह ने उफ्फ तक नहीं की और अनायास ही उनके मुख से निकला, ‘‘चार मुअे तो क्या हुआ, जीवित कई हज़ार। चापेकर बंधुओं की शहादत भी इतिहास में दर्ज है और उनके बलिदान पर जब भगिनी निवेदिता उनकी माँ से मिलने गई और उस वीर माँ की आँख में आँसू देखकर पूछ बैठी, ‘‘माँ आपकी आँख में आँसू क्यों?’’ उस वीर माँ का उत्तर था, ‘‘ये आँसू अपनी मातृभूमि पर शहीद हुए मेरे बेटों के लिये कतई नहीं है, ये आँसू तो इस बात के हैं कि मैंने ऐसे वीर पुत्र और क्यों नहीं जने।’’ ‘‘जननी जने तो भक्तजन या दाता या सूर नहीं तो जननी बांझ रहे काहे गवाये नूर।’’

हमारी आज की कहानी के नायक हैं-शचीन्द्र नाथ सान्याल जो एक महान क्रान्तिकारी थे जिनका जन्म 1893 में वाराणसी में हुआ। उनके पिता का साहस अनुकरणीय है। राष्ट्र का वंदन उस महान आत्मा हरिनाथ सान्याल को जिसने सभी पुत्रों को बंगाल की क्रान्तिकारी संस्था ‘अनुशीलन समिति’ के कार्यों में भाग लेने के लिये प्रेरित किया। इसी का परिणाम था कि शचीन्द्र नाथ के बड़े भाई रवीन्द्रनाथ ‘बनारस षड्यन्त्र केस’ में नजरबन्द रहे, छोटे भाई भूपेन्द्र नाथ को ‘काकोरी क्रान्ति’ में पाँच वर्ष की सजा हुई और तीसरे भाई जतिन्द्रनाथ को लाहौर षड़यन्त्र केस में भगत सिंह आदि के साथ अभियुक्त बनाया गया था। शचींद्रनाथ सान्याल ने क्वींस कालेज (बनारस) में अपने अध्ययनकाल में काशी के प्रथम क्रांतिकारी दल का गठन 1908 में किया।

1913 में फ्रेंच बस्ती चंदननगर में सुविख्यात क्रांतिकारी रास विहारी बोस से उनकी मुलाकात हुई। कुछ ही दिनों में काशी केंद्र का चंदननगर दल में विलय हो गया ओर रासबिहारी काशी आकर रहने लगे। क्रमशः काशी उत्तर भारत में क्रांति का केंद्र बन गई। 1914 में प्रथम महायुद्ध छिड़ने पर सिक्खों के दल ब्रिटिश शासन समाप्त करने के लिए अमरीका और कनाडा से स्वदेश प्रत्यावर्तन करने लगे। रास बिहारी को वे पंजाब ले जाना चाहते थे। उन्होंने शचींद्र को सिक्खों से संपर्क करने, स्थिति से परिचित होने और प्रारंभिक संगठन करने के लिए लुधियाना भेजा। कई बार लाहौर, लुधियाना आदि होकर शचींद्र काशी लौटे और रासबिहारी लाहौर गए। लाहौर के सिक्ख रेजिमेंटों ने 21 फरवरी 1915 को विद्रोह शुरू करने का निश्चय कर लिया। काशी के एक सिक्ख रेजिमेंट ने भी विद्रोह शुरू होने पर साथ देने का वादा किया। योजना विफल हुई, बहुतों को फाँसी पर चढ़ना पड़ा और चारों ओर घर पकड़ शुरू हो गई।

रास बिहारी काशी लौटे। नई योजना बनने लगी। तत्कालीन होम मेंबर सर रेजिनाल्ड क्रेडक की हत्या के आयोजन के लिए शचींद्र को दिल्ली भेजा गया। यह कार्य भी असफल रहा। रासबिहारी को जापान भेजना तय हुआ। 12 मई 1915 को गिरजा बाबू और शचींद्र ने उन्हें कलकत्ते के बंदरगाह पर छोड़ा। दो तीन महीने बाद काशी लौटने पर शचींद्र गिरफ्तार कर लिए गए। लाहौर षड्यंत्र मामले की शाखा के रूप में बनारस पूरक षड्यंत्र केस चला और शचीन्द्र को आजन्म काले पानी की सजा मिली। शचीन्द्रनाथ का शुरुआती जीवन देश की राष्ट्रवादी आंदोलनों की परिस्थितियों में बीता। 1905 में ‘बंगाल विभाजन’ के बाद खड़ी हुई ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी लहर ने उस समय के बच्चों और नवयुवकों को राष्ट्रवाद की शिक्षा व प्रेरणा देने का महान् कार्य किया।

शचीन्द्रनाथ सान्याल और उनके पूरे परिवार पर इसका प्रभाव पड़ा। इसके फलस्वरूप ही ‘चापेकर’ बन्धुओं की तरह ‘सान्याल बन्धु’ भी साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रवादी धारा के साथ दृढ़ता के साथ खड़े रहे। शचीन्द्रनाथ के पिता की मृत्यु 1908 में हो गयी। इस समय उनकी आयु मात्र पन्द्रह साल थी। इसके वावजूद शचीन्द्रनाथ न केवल देश की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध होकर स्वयं आगे बढ़ते रहे अपितु पिता के समान ही अपने तीनों भाइयों को भी इसी मार्ग पर ले चलने में सफल रहे। बाद में वह फिर से ब्रिटिश-क्रांतिकारी और क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गया, सान्याल को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया और एक बार फिर कैद किया गया। इसके अलावा वाराणसी में स्वतंत्रता सेनानी के पैतृक परिवार के घर को भी मजबूत कर दिया गया था।

शचीन्द्रनाथ सान्याल उन कुछ क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्हें पोर्ट ब्लेयर में लगातार दो बार सेलुलर जेल भेजा गया था। अपने समय के दौरान, शचीन्द्रनाथ सान्याल को टीबी से संक्रमित किया गया था और उसे गोरखपुर जेल में स्थानांतरित कर दिया गया था। 7 फरवरी 1942 को गोरखपुर जेल, उत्तर प्रदेश में उनकी मृत्यु हो गई थी। 1931 में क्रांतिकारी भगत सिंह की पहली प्रामाणिक आत्मकथा प्रकाशित की, लेकिन उनके भाई जतिन्द्र नाथ सान्याल ने 1931 में भारत की ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित किया। वर्ष 1937-1938 में कांग्रेस मंत्रीमंडल ने जब राजनीतिक कैदियों को रिहा किया तो उसमे शचीन्द्रनाथ भी रिहा हो गये। लेकिन उन्हें घर पर नजरबंद कर दिया गया। कठिन परिश्रम, कारावास और फिर चिन्ताओं से वे क्षय रोग से ग्रस्त हो गये। सन 1942 में भारत का यह महान् क्रांतिकारी जर्जर शरीर के साथ चिर निद्रा में सो गया।

शचीन्द्रनाथ सान्याल एक जुझारू क्रान्तिकारी, प्रखर राष्ट्रवादी, स्वाभिमानी, उच्च कोटि के विचारक और दार्शनिक थे जो न केवल स्वयं उस कंटीले मार्ग पर जोशीले होकर चले बल्कि उनके मार्गदर्शन ने चन्द्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाकऊल्ला खाँ, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, ठाकुर रोशनसिंह सरीखे युवाओं को क्रान्ति के पथ पर चलने का अदम्य साहस और समर्पित भाव दिया। गिरते हैं शहसवार (घुड़सवार) ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ्ल (छोटा बच्चा) क्या गिरे जो घुटनों के बल चले।

कृतज्ञ राष्ट्र आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें और स्वाधीनता संग्राम में उनके योगदान को विनम्र श्रद्धांजलि देता है।

- डॉ. मार्कन्डेय आहूजा कुलपति, गुरूग्राम विश्वविद्यालय, गुरूग्राम
– डॉ. मार्कन्डेय आहूजा, कुलपति, गुरूग्राम विश्वविद्यालय, गुरूग्राम

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