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वागड़ अंचल में दशहरा की गौरवपूर्ण परम्पराएँ

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दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर संभाग के वागड़ अंचल में दशहरा की अपनी अलग ही गौरवपूर्ण परम्पराएँ है और घर-घर में खीर मालपुआ बनाने के साथ दशहरा मेला का आयोजन और रावण दहन में सभी धर्मों विशेष कर आदिवासियों का भारी संख्या में उत्साह के साथ शामिल होना देखने लायक़ होता है। राजसी काल में दशहरा पर निकलने वाले जुलूस का यहाँ के बाशिंदे आज भी याद करते है। प्रायः मेरे मन मस्तिष्क में बचपन की कई यादें एक फ़िल्म की तरह घूमने लग जाती है। कई खट्टी मीठी स्मृतियां भी जेहन में उभरती है I मेरे जन्म स्थल दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर संभाग के वागड़ अंचल का ऐतिहासिक शहर डूंगरपुर और उसकी मधुर यादें कभी भी मुझसे विस्मृत नही हुई । वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के मेवाड़ राजवंस से ताल्लुक रखने वाली मेरी जन्म भूमि और खूबसूरत शहर डूंगरपुर आज भी मुझे वहाँ के लैंड मार्क गेपसागर की गहराईयों से भी सैकड़ों गुना अधिक प्यारा और दुनियां में सबसे न्यारा लगता है।

सौभाग्य से डूंगरपुर राजपरिवार और प्रतिष्ठित भट्टमेवाड़ा परिवार से जुड़े होने के कारण मेरे घर हमेशा मेहमानों की आवाजाही बनी रहती थी और हमारे आ.बाबूजी, आ.जिया एवं आ.माशाज़िया बहुत ही आदर एवं मनुहार के साथ उनका आतिथ्य सत्कार करते थे। उनके यह संस्कार आज भी हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बने हुए है। हमारे घर पर  भिन्न-भिन्न त्यौहारों पर विभिन्न मिष्ठान्न व व्यंजनों की बहार रहती थी। परिवार के हर सदस्य का जन्मदिन श्रीनाथजी के राजभोग उत्सव के रूप में मनाया जाता था। हम तब पाश्चात्य संस्कृति का प्रतीक केक नही काटते थे।

बचपन का यादगार संस्मरण

मिठाइयों की बात चल निकली है …..तो बचपन के एक संस्मरण का ज़िक्र करना नही भूल सकता हूँ। नित्यांशु के घर की खीर का स्वाद मुझे आज भी याद है। बात मेरे स्कूल दिनों  की है….. नित्यांशु और मैं गहरे मित्र … एक भी दिन बिना मिले नही गुजरता था। उनके पिताजी को हम मामाजी और हमारी जिआ ( मां ) को वे बुआ कहते थे।  रिश्ता बहुत नजदीकी नही था लेकिन उससे भी कहीं अधिक गहरा और आत्मीयता भरा संबंध  थे दोनों परिवारों में। नित्यांशु के पिता, चाचा और हमारे  बाबूजी  तीनों  ही टीचर। कालांतर में हमारे बाबूजी, हमारे दादाजी के अचानक  देहांत के बाद बनारस से अपना गेजुएशन पूरा कर सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर परिवार की परंपरा और बदली परिरिथतियो के कारण डूंगरपुर महारावल लक्ष्मण सिंह साहब के पर्सनल स्टाफ़ में जुड गये और बाद में तत्कालीन स्वतंत्र पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं में सम्पर्क में आकर राष्ट्रीय धुरी पर आ गए।

दशहरा का दिन था। विशेष छुट्टी का दिन। सवेरे के क्रिया कलापों व सेवा पूजा के बाद हमेशा की तरह मैं अपने बचपन के सखा नित्यान्शु मेहता के घर पहुँच गया। नित्यान्शु के घर के आसपास ही मेरा ननिहाल, दादाजी एवं अन्य सगे संबंधी भी रहते थे। हमारे अवकाश के दिन अक्सर इसी मोहल्ले में ही गुजरते थे। हम सभी बहुत अधिक सम्पन्न परिवारों से नहीं थे, बल्कि हम सामान्य परिवार के सदस्य थे,लेकिन संबंधों की सम्पन्नता, प्रगाढ़ता सगे भाई बहनों से भी अधिक मजबूत और गहरी थी।

मन को भावुक कर जाती मामीजी का अपनापन और मनुहार

दशहरा का दिन और भांजा घर पर आ जाएं तो फिर यह ‘सोने में सुहागे’ की तरह था। उनके घर मे प्रवेश करते ही दायीं ओर बड़ा सा रसोई घर था, जिसमें खपरेल की छत से टपकती सूरज की सीधी किरणे कमरे को प्रकाशमान करती थी। उस दशहरा के दिन घर में घुसते ही मुझे इलायची की सुगंघ युक्त खीर की खुशबू की महक ने आनंदित कर दिया। मैंने नित्यान्शु को पुकारा, वह घर पर ही था। हम एक दूसरे से हमेशा की तरह प्रेम से मिले एवं घर की चौपाल (पठार) में बैठ कर काफी समय बातें करते रहे। हम जब शाम को लक्ष्मण ग्राउंड में रावण दहन एवं नवरात्रि गरबों के उत्सव में जाने की योजना बना ही रहे थे, तभी मामीजी दो कटोरियाँ भर खीर लेकर आई और आत्मीयता के साथ उसे हमारे हाथों में थमा दी। खीर का वह स्वाद आज भी मुझे याद है…. स्वाद से बढ़ कर मामीजी का अपनापन और मनुहार मन को आज भी भावुक कर जाती हैं।

नित्यान्शु एवं अन्य कई मेरे बचपन के अजीज मित्र और हमारी अलग दुनियाँ.. हमसे बड़े भाई बहनों की अलग टोलियां थी। बचपन में एक दिन भी हम नही मिले, ऐसा नही होता था। खेलना-कूदना, घूमना- फिरना, पढ़ना-लिखना, लड़ना-झगड़ना, तालाब, कुओं और बावड़ियों में तैरना सीखना, प्रतिदिन महारावल स्कूल के बगीचे में स्थित लायब्ररी में जाना आदि सभी काम हम एक साथ ही करते थे। हमारी इस अंतरंगता ने ही हमें एक दूसरे का घनिष्ठ मित्र बनाया। मन के हर कोने में आज भी यह अंतरंगता बरकरार है।

समय के काल में समा गए वह अमूल्य क्षण

कालान्तर में मेरे युवा छात्र राजनीति एवं पत्रकारिता से जुड़ने से तथा बाद में सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी के रूप में सरकारी सेवा में चले जाने के कारण बढ़ी व्यस्तताओं के चलते वे अमूल्य क्षण समय के काल में समा गए। सभी मित्र अपने-अपने काम धंधों एवं परिवार के साथ जीवन यात्रा को आगे ढकेलने में जुट गए। आज हम सभी अच्छी- अच्छी जगहों पर है। कभी कभार एक दूसरों को याद भी करते है,लेकिन बचपन की वे मधुर स्मृतियां भुलाये नही भूलाई जाती।

वाह! वे भी क्या दिन थे? आज भी उन दिनों में पुनः लौटने की इच्छा जागृत होती है। काश! ऐसा हो सकता……नई पीढ़ी भी संबंधों की इस प्रगाढ़ता को समझ इसका अनुकरण कर रही है। यह हमारे समृद्ध संस्कारों की अमूल्य निधि हैं।

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