शारदीय नवरात्र विशेष: जालोर की पहाडिय़ों में स्थित है बिना धड़ की सुंधा माता, जानिए आस्था की कहानी

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सर सुंधा धड़ कोटड़ा, पग सुंदरला री पाल।
आप माता चामुण्डा इसरी, गले फूलां री माल॥
इसका अर्थ है माँ का सिर सुंधा पर, धड़ कोरटे तथा पग सुंदरला में पूजे जाते हैं।

मरुभूमि राजस्थान का कोसों तक फैला रेत का सुनहरा समंदर अपनी अलग ही छटा बिखेरता है। इसी अरावली पर्वतमाला की श्रृंखला में जालोर जिले का ऐतिहासिक और पौराणिक सौगंध पर्वत स्थित है, जिसे सुंधा पहाड़ के रूप में जाना जाता है। इस पहाड़ पर सुंधा माता का मंदिर बना हुआ है। जो लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है। मंदिर के बाहर ही बने झरने मां के दरबार को शोभा को और भी बढ़ा देते हैं।

मां चामुंडा देवी का यह मंदिर 900 साल से भी अधिक पुराना माना जाता है। यह मंदिर हिल स्टेशन माउंट आबू से 64 किमी और भीनमाल से 20 किमी दूर है। अरावली की पहाडिय़ों में 1220 मीटर की ऊंचाई पर स्थित चामुंडा देवी का यह मंदिर भक्तों के लिए एक पवित्र धार्मिक स्थल है। गुजरात और राजस्थान के बहुत से पर्यटक इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं। जैसलमेर के पीले बलुआ पत्थर से निर्मित यह मंदिर हर किसी को अपनी खूबसूरती से आकर्षित करता है।

शिलालेख बताते है कि मंदिर कितना पुराना

इस मंदिर के अंदर 3 ऐतिहासिक शिलालेख हैं. जो इस जगह के इतिहास के बारे में बताते हैं. यहां का पहला शिलालेख 1262 ईस्वी का है. जो चौहानों की जीत और परमार के पतन का वर्णन करता है। दूसरा शिलालेख 1326 और तीसरा 1727 का है। नवरात्रि के समय यहां पर मेले के आयोजन किया जाता है. इस दौरान गुजरात और आसपास के क्षेत्रों से पर्यटक बड़ी संख्या में सुंधा माता की यात्रा करते हैं, लेकिन इस बार कोरोना की वजह से मेले स्थगित कर दिए गए हैं।

जहां महाराणा प्रताप ने भी शरण ली थी

सुंधा पर्वत का पौराणिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से भी कम महत्व नहीं है। त्रिपुर राक्षस का वध करने के लिए आदि देव की तपोभूमि यहीं मानी जाती है। इसके अलावा चामुंडा माता की मूर्ति के पास एक शिवलिंग स्थापित है और वैदिक कर्मकांड को मानने वाले श्रीमाली ब्राह्मण समाज के उपमन्यु गौत्र के यह कुलदेवता हैं तथा यही नागिनी माता स्थित है, जो इनकी कुलदेवी हैं। यह स्थान अनेक ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रही है तथा यही पर भारद्वाज ऋषि का आश्रम भी बताया जाता है। वर्ष 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध के बाद मेवाड़ शासक इतिहास पुरुष महाराणा प्रताप ने अपने कष्ट के दिनों में सुंधा माता की शरण ली थी। तेरहवीं सदी के शुरुआती सालों में ही भीनमाल गुजरात के सोलंकियों से जालौर के चौहान शासक उदयसिंह ने छीन लिया और जालौर के चौहान शासकों का सुंधा माता के प्रति विशेष आदर भाव रहा है। इसी श्रद्धा के कारण उदयसिंह के पुत्र चाचिगदेव ने इस मंदिर का निर्माण संवत 1312 में करवाया तथा 1319 में अक्षय तृतीया के दिन विधि विधान से माँ चामुंडा की प्रतिष्ठा करवाई गई।

सुंधा पर्वत पर एक गुफानुमा भंवर मां के सिर की पूजा होती है। मंदिर के गुंबद पर स्वर्ण कलश सुशोभित है। जिसके चारों ओर पंक्ति बद्ध करीब 180 कलश है। मंदिर परिसर में करीब एक दर्जन से भी अधिक देव-देवी प्रतिमाएं विद्यमान है।
चामुण्डा माताजी की प्रतिमा के पास वाले स्थान गुफानुमा कक्ष में दक्षिण दिशा वाली दीवार के पूर्वी कोने में एक में विवर मुख है जो एक लंबी सुरंग की तरह है। यह सुरंग पूर्व दिशा में काफी दूर तक चली गई है। सर्प व अन्य वन्य जीवों के भय के कारण इसे बन्द कर दिया गया।

पहले बलि व शराब चढ़ाने की प्रथा भी थी

इतिहासविदों की माने तो सुंधा माता का मंदिर काफी प्राचीन है। जालोर के शासक चाचिगदेव ने संवत् 1319 में अक्षय तृतीया को इस मंदिर की स्थापना की थी। मंदिर में पहले देवी को शराब व बलि चढ़ाने की प्रथा थी, लेकिन 1976 में मालवाड़ा के पूर्व जागीरदार अर्जुनसिंह देवल ने एक ट्रस्ट की स्थापना कर शराब अर्पण व बलि बंद करवा मंदिर में सात्विक पूजन पद्धति शुरू करवाई। इसके बाद ट्रस्ट ने प्रवेश द्वार, धर्मशालाओं, भोजनशालाओं का निर्माण करवाया।

देवी भागवत व तंत्र चूड़ामणि में ऐसी कथा आती है कि सत युग में एक समय दक्ष प्रजापति ने शिव से अपमानित होकर ब्राहस्पत्य नामक यज्ञ किया। जिसमें उसने शिव व सती को आमंत्रित नहीं किया। निमंत्रण न पाकर भी सती अपने पिता के यहां आ गई। घर आने पर भी दक्ष ने सती का सत्कार नहीं किया। अपितु क्रोध कर शिव की बुराई की। पति की निन्दा सती से सहन नहीं हुई और वे यज्ञ कुण्ड में कूद गई। इस पर शिव अपने वीर भद्रादि अनुचरों के साथ वहां पहुंचे, यज्ञ विध्वंस किया। उन्मत्त अवस्था में सती की मृत देह लेकर नाचने लगे तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के अंग-अंग को काट डाला। सती के अंग-प्रत्यग जहां-जहां गिर, वे सभी स्थान शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। सुगन्धा नामक स्थान पर सती की नासिका गिरी। यह पौराणिक कथा संभवत: देवी के मात्र सिर पूजने की प्रथा का मूल कारण रही हो।

सुन्धा(सुंडा) माता जहां राजस्थान का प्रथम रोपवे

इस रोपवे को 20 दिसम्बर 2006 को प्रारंभ किया गया। यह 800 सौ मीटर लम्बा रोपवे है। जिससे 6 मिनट में मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।

खण्डित मूर्तियों का भी यहां किया जाता हैं विर्सजन

हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा के दौरान किसी कारणवश मूर्ति के खंड होने पर उसकी आराधना नहीं होती है, लेकिन राजस्थान में एक पर्वत ऐसा भी है जहाँ खंडित मूर्तियों को रखना पवित्र माना जाता है। विभिन्न राज्यों से सुंधा माता के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु अपने साथ खंडित देवी मूर्तियाँ साथ लाते है। इन प्रतिमाओं को पहाड़ की शिलाओं के नीचे जहाँ उचित समझते है, वहीं रख कर चले जाते हैं।

वैसे तो प्रतिदिन श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है, लेकिन नवरात्र में खासी भीड़ रहती है। सुंधा माता के राजस्थान के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र एवं मध्यप्रदेश से प्रतिवर्ष लाखों लोग यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। हर माह के शुक्ल पक्ष की तेरस से पूर्णिमा तक मंदिर में अधिक दर्शानार्थी आते हैं।

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