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तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पवन वर्मा बोले- राहुल गांधी सोचें कि वोट अपने आप मिलेंगे तो ये चिंताजनक

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जयपुर: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में आए तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पवन वर्मा ने कहा कि -‘देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस परिवर्तन के लिए तैयार नहीं है। अगर राहुल गांधी को लगता है कि बीजेपी की तरह जनता का समर्थन (वोट) अपने आप मिलने लगेगा तो ये कांग्रेस के भविष्य के लिए चिंताजनक है।’ उन्होंने कहा कि देश में पांच राज्यों के चुनाव के बाद कांग्रेस की स्थिति काे इन्हीं शब्दों में बयां किया। वर्मा ने कहा विपक्ष को ये समझना होगा कि वह बीजेपी-आरएसएस की मजबूत इलेक्टोरल मशीन से टक्कर में है। विपक्ष को नए सिरे से संगठित होकर मजबूती से एक पॉजिटिव सॉल्यूशन जनता को ऑफर करना होगा। बीजेपी को घेरने के लिए पर्याप्त मुद्दे होते हुए भी विपक्ष अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहा है। बीजेपी से मुकाबले के लिए विपक्ष को 3 चीजें चाहिए… प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर चेहरा, नेरिटिव और ग्राउंड कनेक्ट। बेहद जरूरी है कि एक निगेटिव एजेंडा से हटकर आप पॉजिटिव क्या ऑफर कर रहे हैं। चुनाव जीतने के लिए ग्राउंड कनेक्ट जरूरी है। जमीनी स्तर पर बिना संगठन आप चुनाव नहीं जीत सकते। बीजेपी और आरएसएस इलेक्टोरल मशीन हैं। आप ने देखा होगा कि चुनाव जीतने के तुरंत बाद नरेंद्र मोदी गुजरात पहुंच गए। विपक्ष को समझना होगा कि वे किससे टक्कर ले रहे हैं। अपने गिरेबां में झांककर अपनी बुनियाद मजबूत करनी होगी।

5 राज्यों के चुनाव परिणाम

पांच राज्याें के चुनाव परिणाम चौंकाने वाले नहीं, बल्कि अपेक्षा के अनुसार ही हैं। बीजेपी के पास तीन शस्त्र थे, जिनका उन्होंने इस्तेमाल किया- राजनीतिक हिंदुत्व, अति राष्ट्रवाद और जमीनी स्तर पर गरीब तबके से जुड़ाव। उन्होंने जमीनी स्तर पर गरीबों की काफी मदद की। दूसरी तरफ विपक्ष पूरी तरह तैयार नहीं था। आप UP में बीजेपी के खिलाफ मुस्लिम -यादव गठजोड़ पर 28-30 % वोट समर्थन से जीत नहीं सकते। सोशल इंजीनियरिंग सही नहीं थी, विपक्ष को आत्मचिंतन की आवश्यकता है।

बीजेपी को घेरने के लिए पर्याप्त मुद्दे थे

ऐसा नहीं है कि देश में वाजिब प्रश्न (या मुद्दे) नहीं हैं। बेरोजगारी है, सामाजिक अस्थिरता है, धर्म का दुरुपयोग है। सामजिक द्वेष बढ़ता जा रहा है, उससे भी लोग त्रस्त हैं। बीजेपी को घेरने के लिए पर्याप्त मुद्दे होते हुए भी विपक्ष अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहा है। केवल हिंदुत्व पर वोट मिल रहा हो, ऐसा नहीं है। प्रादेशिक चुनाव में और भी फैक्टर होते हैं। बंगाल में बीजेपी का एक ही एजेंडा था हिंदुत्व, लेकिन हार गई।

ममता बनर्जी को समझना होगा 

जितनी भी प्रादेशिक पार्टियां हैं , कांग्रेस के लुप्त होने के कारण उनमें महत्वाकांक्षा बढ़ी है कि हम अपना प्रभाव बढ़ाएं, जो स्वाभाविक है। यूपी में ममता बनर्जी का जाना गठबंधन नहीं था, एक कोशिश थी कि जो विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत है, उसका हौसला बना रहे। उनको भी समझना होगा और वह समझती होंगी कि इस तरह हौसला बुलंद करना अपनी जगह है और चुनाव में रणनीति बनाकर जमीन पर काम करना अलग बात है।

औरतों को बराबरी की जगह मिलनी चाहिए

‘ये कोई बात नहीं है कि हम ये कहकर मुस्लिम महिलाओं का समर्थन कर रहे हैं की उनको हिजाब पहनना ही चाहिए। जहां तक मैं समझता हूं कुरान में कहीं नहीं लिखा कि औरतों को हिजाब पहनना ही चाहिए। परिवर्तन हर समुदाय में होना चाहिए। औरतों को बराबरी की जगह मिलनी चाहिए, पर इसको अगर थोपा जाए, यानी जब इस बात पर मुस्लिम विद्यार्थियों को रोका जाए, उसी वक्त कुछ बजरंग दल और आरएसएस के लोग भगवा स्कार्फ पहनकर पहुंच जाएं और जय श्री राम के नारे लगाएं , तो क्या कोई संवाद संभव है ? मान लीजिये एक हिन्दू समुदाय में महिलाओं को लेकर परिवर्तन या रिफॉर्म की बहस चल रही है और कुछ मुस्लिम लड़के वहां अल्लाह हू अकबर के नारे लगाएं तो क्या संवाद संभव है ?”

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