धर्म संघ संस्कृत महाविद्यालय में करपात्रीजी महाराज की मनाई जयंती

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श्रीगंगानगर। अखिल भारतीय धर्म संघ के संस्थापक करपात्री महाराज की जयंती मोहनपुरा रोड पर श्रीधर्म संघ संस्कृत महाविद्यालय के प्रांगण में मनाई गई। इस अवसर पर ब्रह्मचारी श्रीकल्याण स्वरूप महाराज ने करपात्री जी महाराज के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि धर्म सम्राट यह एक ऐसा नाम है जो संभवत बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ विद्वान धर्म और संस्कृति के पूर्ण जानकार सत् श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ तथा शंकराचार्य परंपरा के कर्णधार के रूप में जाना जाता रहेगा। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में भटनी ग्राम में की धरती में जन्मे यतिचक्र चूणामणि करपात्रीजी महाराज नरवर संस्कृत विद्यालय में पढ़ने वाले तथा 24 घंटे एक पैर पर तपस्या करने वाले, अखिल भारतीय धर्म संघ के संस्थापक, का जन्म श्रावण शुक्ल द्वितीया को 7 फरवरी 1907 को हुआ। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री महाराज भारत के एक सन्त, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं राजनेता थे। उनका मूल नाम हरि नारायण ओझा था। वे दशनामी परम्परा के संन्यासी थे।

दीक्षा के उपरान्त उनका नाम ‘‘हरिहरानन्द सरस्वती’’ था किन्तु वे ‘‘करपात्री’’ नाम से ही प्रसिद्ध थे क्योंकि वे अपने अंजुलि का उपयोग खाने के बर्तन की तरह करते थे (कर-हाथ, पात्र-बर्तन, करपात्री-हाथ ही बर्तन हैं जिसके)। उन्होने अखिल भारतीय राम राज्य परिषद नामक राजनैतिक दल भी बनाया था। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुए इन्हें ‘‘धर्मसम्राट’’ की उपाधि प्रदान की गई। स्वामी जी की स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि एक बार कोई चीज पढ़ लेने के वर्षों बाद भी बता देते थे कि ये अमुक पुस्तक के अमुक पृष्ठ पर अमुक रूप में लिखा हुआ है। आज जो रामराज्य सम्बन्धी विचार गांधी दर्शन तक में दिखाई देते हैं, धर्म संघ, रामराज्य परिषद्, राममंदिर आन्दोलन, धर्म सापेक्ष राज्य, आदि सभी के मूल में स्वामीजी ही है।

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