नहीं रहे जस्टिस महेश चन्द्र शर्मा

जयपुर। मानवाधिकार आयोग के सदस्य जस्टिस महेश चंद शर्मा की अचानक तबीयत बिगड़ने के कारण उनका निधन हो गया। उनकी तबियत बिगड़ने के बाद जस्टिस महेश चंद शर्मा को एसएमएस अस्पताल लाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। इससे न्यायिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। जस्टिस महेश चंद शर्मा मूलत: दौसा के रहने वाले थे। उनके कार्डिक अटैक से निधन होने की बात सामने आ रही। जस्टिस महेश चंद शर्मा के निधन पर मुख्य सचेतक महेश जोशी ने भी शोक संवेदनाएं व्यक्त की और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

गायों को लेकर दिया उनका फैसला नजीर बन गया
एक जून, 1955 को दौसा में जन्में जस्टिस शर्मा  5 जुलाई, 2007  से 31 मई, 2017 तक  राजस्थान हाईकोर्ट में न्यायाधीश रहे। उनका हिंगोनिया गौशाला के संबंध में दिया गया 140पेज का फैसला देशभर में एक नजीर बना। 10 साल हाईकोर्ट में न्यायाधीश रहते हुए जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने 1,10902 प्रकरणों में फैसला दिया। 03 अक्टूबर, 2018 को उन्हें राजस्थान राज्य मानव अधिकार आयोग का सदस्य बनाया गया। 05 दिसम्बर, 2019 को उन्हें आयोग में कार्यवाहक चेयरमैन की जिम्मेदारी दी गई।
जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने एवं कानूनी पहचान मिलने का सुझाव भी दिया था। जैसे गंगा-जमुना को जीवित ईकाई का दर्जा दिया गया है। नेपाल ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर रखा हैं। हमें भी अनुसरण करना चाहिए। उन्होंने कहा था कि यह उनकी आत्मा की आवाज हैं और धर्मनिरपेक्षता से इसका कोई लेना-देना नहीं हैं। गाय की हत्या करने वालों को आजीवन कारावास मिलना चाहिए।

 

वे अनमोल रत्न थे : ओझा
विप्र फाउंडेशन के संस्थापक संयोजक सुशील ओझा ने जस्टिस महेश चंद शर्मा  के निधन को समाज की अपूरणीय क्षति बताते हुए कहा कि वे अनमोल रत्न थे। उनके ऐतिहासिक फैसलों की सदियों तक मिसाल दी जाती रहेगी। जस्टिस महेश शर्मा विप्र फाउंडेशन संरक्षक मंडल में थे। वे सामाजिक सरोकारों में भी बढ़ चढ़कर भाग लेते थे।

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