ग्रीन बॉन्ड, प्राकृतिक खेती, पीएलआई स्कीम (सोलर) व इलेक्ट्रिक व्हीकल की बजट घोषणाओं पर क्या सोचते हैं विशेषज्ञ

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जयपुर : वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज वित्त वर्ष 2022-23 के लिए देश का बजट पेश किया। इस बजट में ग्रीन बॉन्ड, प्राकृतिक खेती, पीएलआई स्कीम-सोलर, इलेक्ट्रिक व्हीकल को लेकर कई घोषणाएं हुई। इसको लेकर एक्सपर्ट्स के क्या विचार आइये जाने …

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ग्रीन बॉन्ड (Green bond)

“सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड को जारी करने का बजट प्रस्ताव कई तरह से लाभकारी है। इनमें सबसे प्रमुख लाभ क्लाइमेट एक्शन (जलवायु परिवर्तन को रोकने संबंधी उपायों) को आगे बढ़ाने के प्रति देश की गंभीरता का संकेत है। भारत अब उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो जाएगा, जिनमें मुख्य तौर पर यूरोपीय देश हैं, जिन्होंने ऐसे ग्रीन बांड जारी किए हैं। इस कदम से हम घरेलू कॉरपोरेट ग्रीन बॉन्ड बाजार के विकास में उछाल की भी उम्मीद कर सकते हैं।

विदेशी ऋण पूंजी बाजारों में भारतीय कंपनियों की ओर से ग्रीन बांड जारी करना अब तक काफी पिछड़ा हुआ है। अगर कम लाभ पर सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड की कीमत और उसके समकक्ष नॉन-ग्रीन बॉन्ड में तुलना हो, तो यह निजी क्षेत्र को ग्रीन इंवेस्टमेंट (हरित निवेश) में अपनी पूंजी लगाने के लिए एक अतिरिक्त संकेत भी देगा। यह महत्वपूर्ण कदम पूंजीगत व्यय को बढ़ावा देने से भी जुड़ा है, ,जो बजट की एक प्रमुख विशेषता है। इतना ही नहीं, यह वित्त मंत्री की ओर से अपने बजट भाषण में प्रमुखता से बताए गए सात स्तंभों में से तीन स्तंभों: ऊर्जा परिवर्तन, क्लाइमेट एक्शन, और निवेश का वित्तपोषण को भी परिभाषित करता है।”
– गगन सिद्धू, डायरेक्टर, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू)-सेंटर फॉर एनर्जी फाइनेंस (सीईएफ)

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प्राकृतिक खेती (Natural farming)

“प्राकृतिक खेती, मोटे तौर पर सतत् कृषि , के लिए सहायता की घोषणा एक स्वागत योग्य कदम है। जहां गंगा नदी के आस-पास प्राकृतिक खेती पर जोर दिया जा रहा है, वहीं सरकार को वर्षा सिंचित क्षेत्रों (जहां पर खेती पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है) पर भी विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए। इन वर्षा सिंचित क्षेत्रों में 50 प्रतिशत भारतीय किसान रहते हैं और वे प्राकृतिक खेती को अपनाने से होने वाले लाभ के प्राथमिक हकदार हैं। सरकार को प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों का प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत ऑटोमेटिक रजिस्ट्रेशन के बारे में विचार करना चाहिए, ताकि उन्हें सुरक्षा दी जा सके और ज्यादा से ज्यादा किसानों को सतत् खेती को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।”
-अभिषेक जैन, फेलो और डायरेक्टर, पावरिंग लाइवलीहुड, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू)

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पीएलआई स्कीम-सोलर (Production Linked Incentive scheme-Solar)

“चूंकि भारत सोलर मॉड्यूल की जरूरतें पूरी करने के लिए आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है, इसलिए उच्च दक्षता वाले सोरल मॉड्यूल के निर्माण के लिए 19,500 करोड़ रुपये की अतिरिक्त (कुल 24,000 करोड़ रुपये) बजट की घोषणा कई मौजूदा और संभावित निर्माताओं को एकीकृत विनिर्माण सुविधा बनाने के लिए प्रेरित करेगी। सोलर मॉड्यूल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी और विनिर्माण के लिए रियायती कर व्यवस्था (15 प्रतिशत) के विस्तार (मार्च 2024 तक) के साथ यह पीएलआई योजना, भारत को सोलर मॉड्यूल और संबंधित उत्पादों के लिए वैश्विक विनिर्माण और शोध व विकास (आर एंड डी) का केंद्र (हब) बनने के लिए मुख्य उत्प्रेरक साबित हो सकता है।

इसके अलावा, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने से नई नौकरियां पैदा होंगी, विदेशी मुद्रा का बाहर जाना कम होगा और भारत को वैश्विक सप्लाई चेन की अड़चनों के झटकों से भी बचाएगा। भारत के पास पॉलिसिलिकॉन और वेफर निर्माण का कोई अनुभव नहीं है और सोलर सेल निर्माण का अनुभव भी सीमित है। ऐसे में इस अवसर का लाभ उठाने के लिए मानव संसाधन को कुशल बनाने और शोध व विकास को बढ़ाने में प्रमुखता से निवेश करने की जरूरत होगी। उच्च शिक्षण संस्थानों को भी उद्योग की कौशल संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने पाठ्यक्रमों को इसके अनुरूप बनाने की जरूरत होगी।”
ऋषभ जैन, प्रोग्राम लीड, सीईईडब्ल्यू-सेंटर फॉर एनर्जी फाइनेंस

इलेक्ट्रिक व्हीकल (EVs)

“इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ाने में सीमित चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एक प्रमुख चुनौती रही है। बजट में बैटरी की अदला-बदली (स्वैपिंग) और इंटर-ऑपरेबिलिटी की घोषणा से इलेक्ट्रिक वाहनों में उपयोगकर्ताओं का भरोसा बढ़ सकता है, और अन्य लोगों को इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने के लिए प्रेरित कर सकता है। बैटरी स्वैपिंग नीति के अनुरूप, वाहन निर्माताओं को एकजुट होकर काम करने और अपने सभी उत्पादों में इंटरऑपरेबल बैटरी के साथ मॉडल लाने की जरूरत होगी। इसके अलावा, सरकार ने चार्जिंग स्टेशन और बैटरी स्टोरेज को बुनियादी ढांचे की सुसंगत सूची के हिस्से के रूप में शामिल किया है, जो क्रेडिट उपलब्धता को सुविधाजनक बनाएगा। ईवी चार्जिंग का बुनियादी ढांचा बनाने के लिए स्थानीय शहरी निकायों, डिस्कॉम और वित्तीय संस्थानों के कर्मचारियों की सक्रिय भागीदारी और प्रशिक्षण बहुत महत्वपूर्ण होगा। स्टार्टअप और स्थापित कंपनियां बैटरी स्वैपिंग या चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के अपने प्रयासों को बढ़ाने के लिए ‘सेवा के रूप में बैटरी/ऊर्जा’ व्यवसाय मॉडल की संभावनाएं तलाश सकती हैं।”
– ऋषभ जैन, प्रोग्राम लीड, सीईईडब्ल्यू-सेंटर फॉर एनर्जी फाइनेंस

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