@Vishal Vimlesh Sharma
भारत के लिए 18 मई 1974 का दिन ऐतिहासिक एवं गौरवशाली दिन था जब भारत परमाणु सम्पन्न बन विश्व के सबसे शक्ति सम्पन्न पांच देशों अमेरिका,रूस,फ्रांस,इंग्लैंड व चीन की कतार में आ खड़ा हुआ था। भारतीयों के लिए इससे बड़ी सफलता क्या हो सकती हैं।
इस सफलता को दिलवाने में वैज्ञानिकों की मेहनत और उनका शोध तो था ही उसके साथ उस समय की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का अदम्भ्य साहस भी कम नहीं था जिसने ताकतवर राष्ट्रों को इन राष्ट्रों की मनाही के बावजूद आंख दिखाने का दुस्साहस किया।
ईश्वरीय शक्ति भी थी भारत के साथ
भारतीय वैज्ञानिकों की मेहनत पर तो बुद्ध भी मुस्काराएं थे यानी ईश्वरीय शक्ति का भी भारत को परमाणु सम्पन्न बनाने में पूरा आशीर्वाद था। पोकरण में हुए इस परमाणु विस्फोट का कोड ही बुद्धा इज़ स्माइलिंग था। विष्णु के नवें अवतार बुद्ध के नाम का कोड भी वैज्ञानिकों ने पूरी शिद्धत के साथ सोच समझकर रखा होगा। विष्णु सम्पूर्ण विश्व की सर्वोच्च शक्ति तथा नियंता माने जाते हैं। सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु के प्रति पोकरण परमाणु विस्फोट-1 के मिशन में शामिल बहुत से वैज्ञानिकों की आस्था भी थी।

पोखरण परमाणु मिशन प्रथम में शामिल वैज्ञानिक पी के आएंगर ने तो यहां तक लिख डाला कि वो गज़़ब का दृश्य था। अचानक मुझे वो सभी पौराणिक कथाएं सच लगने लगी थीं जिसमें कहा गया था कि कृष्ण ने एक बार पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया था। कृष्ण भी बुद्ध की तरह विष्णु अवतारी हैं।
रेत के पहाड़ को मानो हनुमान ने उठा लिया
रमन्ना इयर्स ऑफ़ पिलग्रिमेज में लिखते हैं कि परमाणु विस्फोट की जब उल्टी गिनती चल रही थी तो उनके साथी वैंकटेशन इस दौरान लगातार विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहे थे। इसी तरह कंट्रोल रूम में मौजूद श्रीनिवासन को लगा जैसे वो ज्वार भाटे वाले समुद्र में एक छोटी नाव पर सवार हों जो बुरी तरह से डगमगा रही हो। रमन्ना ने अपनी आत्मकथा में लिखा, “मैंने अपने सामने रेत के पहाड़ को ऊपर जाते हुए देखा मानो हनुमान ने उसे उठा लिया।

सम्पन्न राष्ट्रों के पैरों तले जमीन खिसक गई थीं
जैसे ही रेडियो पर उद्घोषक के स्वर गूँजे, आज सुबह आठ बजकर पांच मिनट पर भारत ने पश्चिमी भारत के एक अज्ञात स्थान पर शांतिपूर्ण कार्यों के लिए एक भूमिगत परमाणु परीक्षण किया है। इस घोषणा पर पूरा देश झूम उठा था तो दूसरी तरफ विश्व के शक्तिशाली कहे जाने वाले राष्ट्रों के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी।
खुशी से झूम उठे थे वैज्ञानिक
भारत में खुशी का आलम तो यह था कि पोखरण में परमाणु परीक्षण करने गए वैज्ञानिक भी खुशी से इस तरह झूम उठे थे और वे इस उत्तेजना में भूल गए कि थोड़ी देर में धरती कांपने वाली है। 107 मीटर नीचे ज़मीन में गड़ी 1400 किलो वजनी और 1.25 मीटर चौड़ी एक चीज़ तेज़ धमाके के साथ फटी और आस-पास की धरती को हिला गई।


उन्होंने तुरंत ही मचान से नीचे उतरना शुरू कर दिया, जैसे ही धरती हिली मचान से उतर रहे रमन्ना अपना संतुलन नहीं बरकऱार रख पाए और वो भी ज़मीन पर आ गिरे। ये एक दिलचस्प इत्तेफ़ाक़ था कि भारत के परमाणु बम का जनक, इस महान उपलब्धि के मौक़े पर पोखरण की चिलचिलाती गर्म रेत पर औंधे मुँह गिरा पड़ा था।
ये थे परीक्षण स्थल पर मौजूद
पोखरण के रेगिस्तान में गर्मी कुछ ज़्यादा ही थी। विस्फोट को देखने के लिए वहाँ से पाँच किलोमीटर दूर एक मचान सा बनाया गया था। उस पर होमी सेठना, राजा रमन्ना, तत्कालीन थलसेनाध्यक्ष जनरल बेवूर, डीआरडीओ के तत्कालीन अध्यक्ष बीडी नाग चौधरी, टीम के उपनेता पी के आयंगर और लेफि़्टनेंट कर्नल पीपी सभरवाल मौजूद थे। नाग चौधरी के गले में कैमरा लटक रहा था और वो लगातार तस्वीरें खींच रहे थे।
इसलिए पांच मिनट विलम्ब से हुआ परीक्षण
चिदंबरम और एक दूसरे डिज़ाइनर सतेंद्र कुमार सिक्का कंट्रोल रूम के पास एक दूसरे मचान पर थे। श्रीनिवासन और इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेशन टीम के प्रमुख प्रणव दस्तीदार कंट्रोल रूम के अंदर थे। परीक्षण के लिए सुबह आठ बजे का समय निर्धारित किया गया था,लेकिन परीक्षण पर जीप के खराब हो जाने से हुए विलम्ब के कारण परीक्षण का समय पाँच मिनट और बढ़ाया गया था।
बाँछे खिल गई थीं इंदिराजी की
बताते है कि इस मिशन को इतना गोपनीय रखा गया था कि उस समय के रक्षामंत्री व विदेश मंत्री तक को भी इसकी भनक नहीं थी। उनसे तो बाद में केवल घोषणा करवाई गई थी। पूरे परमाणु मिशन की स्वयं इंदिरा गांधी अपने एक वफादार सलाहकार के साथ कमान संभाले हुए थी। प्रधानमंत्री हाउस के अन्य अधिकारियों तक को इसकी भनक तक नहीं लगने दी गई थी।


इंदिरा जी के सहायक पीएन धर ने जैसे ही परमाणु विस्फोट की जानकारी दी तो ये सुनते ही इंदिरा गाँधी की बाँछे खिल गई थीं। एक जीत की मुस्कान को उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता था। सबके चेहरों पर मुस्कुराहट के लिए मिशन का कोड वर्ड बुद्धा इज़ स्माइलिंग रखा गया था।
सेठना ने साफ कह दिया था कि अब पीछे नहीं हट सकते
बताते है कि पाँच दिन पहले 13 मई को परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी सेठना की देखरेख में भारत के परमाणु वैज्ञानिकों ने परमाणु डिवाइस को असेंबल करना शुरू किया था। 14 मई की रात डिवाइस को अंग्रेज़ी अक्षर एल की शक्ल में बने शाफ़्ट में पहुंचा दिया गया था। अगले दिन सेठना ने दिल्ली के लिए उड़ान भरी। इंदिरा गाँधी से उनकी मुलाक़ात पहले से ही तय थी। सेठना ने इंदिराजी से कहा कि हमने डिवाइस को शाफ़्ट में पहुंचा दिया है। अब आप मुझसे ये मत कहिएगा कि इसे बाहर निकालो, क्योंकि ऐसा करना अब संभव नहीं है। अब आप हमें आगे जाने से नहीं रोक सकतीं।

गो अहेड
इंदिराजी का जवाब था, गो अहेड, क्या तुम्हें डर लग रहा है ? सेठना बोले,बिल्कुल नहीं, मैं बस ये बताना चाह रहा था कि अब यहाँ से पीछे नहीं मुड़ा जा सकता। अगले दिन इंदिरा गाँधी की मंज़ूरी ले कर सेठना पोखरण वापस पहुँचे और परमाणु परीक्षण की तैयारियों को अंतिम रूप दे नियत दिन यानी 18 मई 1974 को पूरे विश्व को चौंका दिया।
भारत यूं बना छठी परमाणु शक्ति
पोखरण में हुए प्रथम परमाणु विस्फोट ने जिसने विश्व शक्तियों की अनिच्छा के बावजूद भारत को छठी परमाणु शक्ति बना दिया था। दुनिया के विरोध के बावजूद भारत ने साफ़ कह दिया था कि संप्रभु राष्ट्र होने के नाते उसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु शक्ति विकसित करने का अधिकार है।

भारत ने तब कहा था, बुद्ध मुस्कुरा रहे हैं
भारत ने कहा कि बुद्ध मुस्कुरा रहे हैं। दुनिया ने पूछा, कैसे? जवाब मिला कि यह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया गया प्रयोग है और शांति और बुद्ध एक दूसरे के पर्यायवाची है। हालांकि, दुनिया ने मानने से इनकार कर दिया था। इसके चलते यह परीक्षण गुस्से का कारण बन गया था, क्योंकि यह परमाणु परीक्षण एक ऐसे देश ने किया था जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के पांच स्थायी सदस्यों से इतर था।
भारत को सहने पड़े थे कई प्रतिबंध
यह प्रयोग अंतराष्ट्रीय समुदाय को चेतावनी दिए बिना हुआ। नतीजतन अमेरिका ने बिना किसी चेतावनी के भारत को परमाणु समुदाय में प्रवेश करने से रोकना शुरू कर दिया। भारत को मिलने वाली सहायता रोक दी और कई सारे प्रतिबंध लगा दिए गए। लम्बे समय बाद ये प्रतिबंध हटे।
पीवी नरसिम्हा राव की इच्छा जो अधूरी रह गई
इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी पीएम बने, लेकिन उन्होंने एटम बम में दिलचस्पी नहीं दिखाई। राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिम्हा राव देश के अगले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने इंदिरा गांधी के बाद भारत में न्यूक्लियर टेस्ट करने की इच्छा जताई। उन्होंने वैज्ञानिकों को तैयारी के निर्देश दे दिए थे, लेकिन इस बीच चुनाव मे कांग्रेस की हार होने से टेस्ट टल गया।

न्यूक्लियर सुपरपावर बनाया अटलजी ने
पीवी नरसिम्हा राव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी देश के नए प्रधामंत्री बने और उन्होंने शपथ लेने के दूसरे दिन ही एटम टेस्ट का निर्णय लेकर सभी को हैरान कर दिया, लेकिन 13 दिन बाद ही वाजपेयी की सरकार भी गिर गई और टेस्ट एक बार फिर टल गया। अगली बार एनडीए की सरकार बनी तो वाजपेयी ने आते ही अपनी सरकार के दो महीने बाद ही पोखरण-2 का आदेश दिया। पोखरण में एक बार वैज्ञानिक टेस्ट के लिए तैयार थे और 11 मई 1998 को दोपहर 3.45 पर अंडरग्राउंड विस्फोट कर भारत ने सफल न्यूक्लियर टेस्ट कर दिया, जिसका नाम था- शक्ति। जिसके बाद, भारत सरकार ने घोषणा करते हुए कहा कि हम अब न्यूक्लियर स्टेट की लिस्ट में आ गए है। पीएम वाजपेयी के कार्याकाल की यह अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धी में से एक है, जिन्होंने भारत को दुनिया के सामने न्यूक्लियर सुपरपावर होने का दम दिखाया।
