2050 में भारत में बिकने वाली 75 फीसदी यात्री गाड़ियां इलेक्ट्रिक हो सकती हैं: सीईईडब्ल्यू

  • 2030 में बिकने वाले दोपहिया वाहनों में से आधे और नए चारपहिया वाहनों में से एक चौथाई इलेक्ट्रिक हो सकते हैं
  • 2050 तक नए चार पहिया वाहनों की बिक्री में 9 गुना की बढ़ोतरी होने की उम्मीद
  • चार्जिंग नेटवर्क लगाने की धीमी रफ्तार और सप्लाई चेन में आने वाली रुकावटें, इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की रफ्तार को धीमा कर सकती हैं

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नई दिल्ली: भारत में 2030 और 2050 तक बिक्री होने वाले नए वाहनों में इलेक्ट्रिक यात्री वाहनों की हिस्सेदारी क्रमश: 30 प्रतिशत और 75 प्रतिशत हो सकती है। यह जानकारी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) की ओर से आज जारी किए गए स्वतंत्र अध्ययन ‘इंडिया ट्रांसपोर्ट एनर्जी आउटलुक’ में दी गई है। वास्तव में, 2030 में बिकने वाले नए दोपहिया वाहनों में से आधे और नए तिपहिया व चार पहिया वाहनों में से एक चौथाई से ज्यादा वाहन इलेक्ट्रिक हो सकते हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में इस तेज वृद्धि को बरकरार रखने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में बहुत ज्यादा निवेश करने और स्थानीय सप्लाई चेन के विकास में मदद करने की जरूरत होगी।

सीईईडब्ल्यू का ‘इंडिया ट्रांसपोर्ट एनर्जी आउटलुक’ अध्ययन आगे बताता है कि अगले तीन दशकों में चार पहिया वाहनों के स्वामित्व में नौ गुना की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, आमदनी बढ़ोतरी के साथ दोपहिया वाहनों के स्वामित्व में स्थिरता (सेचुरेशन) आएगी। आमदनी बढ़ने के साथ चार पहिया वाहनों में आने वाला भारी उछाल, परिवहन क्षेत्र के लिए ऊर्जा की मांग और उत्सर्जन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करेगा। अभी, परिवहन क्षेत्र की भारत की कुल ऊर्जा खपत में हिस्सेदारी लगभग 21 प्रतिशत है और विकसित देशों की तुलना में कम उत्सर्जन होता है।

सीईईडब्ल्यू के फेलो डॉ. वैभव चतुर्वेदी ने कहा, “प्रति व्यक्ति आय में अपेक्षित बढ़ोतरी के अनुरूप, अगले 30 वर्षों में भारत के परिवहन क्षेत्र में ऊर्जा की मांग कई गुना बढ़ने वाली है। इसलिए, भारत के लघु और दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्यों के लिए, परिवहन क्षेत्र, विशेष रूप से ज्यादा मुश्किल विमानन और लंबी दूरी की माल ढुलाई क्षेत्र से कार्बन उत्सर्जन को घटाना बहुत महत्वपूर्ण है। हमारी सरकारों को इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए स्थानीय सप्लाई चेन और चार्जिंग नेटवर्क विकसित करने में निवेश करने को प्राथमिकता देनी चाहिए और ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो लोगों को सार्वजनिक परिवहन अपनाने को प्रोत्साहित करें। साथ ही, भारत को परिवहन क्षेत्र में ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल लाने के लिए शोध एंव विकास (आरएंडडी) को बढ़ावा देने वाले एक इकोसिस्टम को विकसित करने के लिए वैश्विक भागीदारी खोजनी चाहिए।”

भारत की माल ढुलाई सेवा की मांग भी 2050 तक पांच गुना बढ़कर 10,000 अरब टन किलोमीटर पहुंच जाने की उम्मीद है, जो 2020 में लगभग 2,000 अरब टन किलोमीटर थी। इसलिए, ग्रीन हाइड्रोजन और प्राकृतिक गैस को माल ढुलाई क्षेत्र से उत्सर्जन को घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। सीईईडब्ल्यू के अध्ययन ने यह भी रेखांकित किया है कि निजी वाहनों के स्वामित्व में बढ़ोतरी और हवाई यात्रा में त्वरित वृद्धि के कारण सार्वजनिक परिवहन की हिस्सेदारी में जो गिरावट आएगी, उससे परिवहन क्षेत्र से कार्बन उत्सर्जन को घटाने के भारत के प्रयासों को चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

सीईईडब्ल्यू के सीनियर प्रोग्राम लीड डॉ. हिमानी जैन ने कहा, “आने वाले दशकों में, भारत में तेजी से शहरीकरण होना निश्चित है, और 2050 तक शहरों में घरों की मांग काफी ज्यादा बढ़ने की संभावना है। संसाधन के रूप में भूमि पर दबाव बढ़ने के साथ, निजी वाहनों के स्वामित्व और इस्तेमाल को सीमित करना बहुत जरूरी होगा। परिवहन क्षेत्र से ऊर्जा और भूमि की मांग में बढ़ोतरी से बचने के लिए, सरकारों को सार्वजनिक परिवहन को अपनाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए, खास तौर पर बड़े शहरों में, जहां निजी वाहनों की उपलब्धता बहुत ज्यादा है। इसके अलावा, ईवी इकोसिस्टम में निवेश करने से ग्राहकों को अपने पारंपरिक वाहनों की जगह पर इलेक्ट्रिक वाहनों को खरीदने के लिए तैयार करने में मदद मिलेगी।”

2021 में, भारत ने इलेक्ट्रिक वाहनों और एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल बैटरी के स्थानीय निर्माण में निवेश को आकर्षित करने के लिए दो प्रोडक्शन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजनाएं शुरू की थी। वहीं, इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग बढ़ाने के लिए, भारत, फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ हाइब्रिड एंड इलेक्ट्रिक व्हीकल (फेम) योजना के जरिए इलेक्ट्रिक वाहन खरीद के लिए प्रोत्साहन दे रहा है।

‘इंडिया ट्रांसपोर्ट एनर्जी आउटलुक’ अध्ययन को यहां पर देखा जा सकता है-https://www.ceew.in/publications/india-transport-energy-use-carbon-emissions-and-decarbonisation

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