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राजस्थान को लेकर कांग्रेस का सुलह फार्मूला: पायलट दिल्ली, खास समर्थकों का पुर्नवास

जयपुर। राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की उत्तराखंड( देहरादून ) यात्रा के कई सियासी मायने हैं। कांग्रेस हाईकमान उन्हें हर हाल में देश की राजनीति में सक्रिय करना चाहता हैं। दिल्ली के लेबल पर जनाधार वाले नेता की आवश्यकता भी है जो पायलट के जाने से कुछ हद तक पूरी की जा सकती है।

इसी रणनीति के तहत महंगाई विरोधी आंदोलन में प्राण फूंकने पायलट को देहरादून भेजा हैं। पायलट हाई कमान के दिल्ली की राजनीति में सक्रिय करने के फैसले पर लगभग तैयार भी हो गए बताए लेकिन पेच केवल इतना सा अटका हुआ है कि वे चाहते हैं कि 11 माह पूर्व आलाकमान को जो मांगपत्र पर फैसला हो जाए, जबकि दिल्ली चाहती है कि पायलट देश की राजनीति में सक्रिय हो जाये तो बाकी मसले स्वतः स्फूर्त सुलट जाएंगे।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी पायलट के दिल्ली जाने के बाद संगठन व राजनीतिक नियुक्तियां, मंत्रिमंडल में उनके समर्थकों को स्थान देने में गुरेज नहीं। पायलट के राजस्थान में रहते जो दो पावर सेंटर बने हुए हैं उस स्थिति में भी काफी बदलाव आ जाएगा। पायलट को इस फार्मूले पर मानने के किये जा रहे प्रयासों के तहत ही दिल्ली आलाकमान के यहां से किसी वरिष्ठ नेता का फ़ोन भी आया था।

पायलट से फोन पर लंबी बात की गई,लेकिन पायलट बार-बार ये कहते सुने गए कि पहले 11 माह पूर्व जो मांगपत्र दिया गया था उस पर फैसला हो जाए। जानकर सूत्रों ने बताया कि इसी बातचीत में पायलट को देहरादून भेजने की बात हुई बताई।

पायलट देहरादून की इस यात्रा पर जाने को तैयार हो गए पर किंतु-परंतु का छोटा सा पेच ज्यों का त्यों अटका हुआ है। हालांकि, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच सुलह समझौते में लगे राजस्थान के प्रभारी महामंत्री अजय माकन को भरोसा है कि ये विवाद शीघ्र निपट जाएगा।

गहलोत खेमे के निकटवर्ती सूत्रों का भी कहना है कि पायलट दिल्ली चले जाएं तो बात बन सकती है, क्योंकि पायलट की दिल्ली में व्यस्तता होने से राजस्थान की अंदरूनी राजनीति से थोड़ा ध्यान हटेगा। समर्थक नेता भी शांत पड़ जाएंगे। पायलट समर्थक कुछ लोगों का राजनीतिक पुर्नवास हो जाने से वे भी ढीले पड़ जाएंगे।

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