जयपुर: देश स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है और राष्ट्रपिता की 152 वीं जयंती भी इस अमृत महोत्सव का एक पड़ाव है । एक जिज्ञासु के रूप में सदैव मन में एक प्रश्न उठता रहा कि देश की स्वतंत्रता के लिए हजारों-लाखों लोगों ने संघर्ष किया, आत्मबलिदान किया लेकिन फिर उनमें से एक महात्मा कैसे हो गया ? आखिर ऐसा क्या था कि महानतम वैज्ञानिकों में से एक अल्बर्ट आइंसटीन ने महात्मा गांधी के बारे में कहा कि “आने वाली पीढियां शायद ही यह विश्वास कर पाएं कि हाड़-मांस वाला कोई ऐसा व्यक्ति दुनिया में पैदा हुआ था”। इसी प्रकार के प्रश्नों ने मुझे मोहनदास करमचंद गांधी के बारे और अधिक जानने तथा उनके जीवन-दर्शन को समझने के लिए प्रेरित किया।
मोहनदास करमचंद गांधी एक औसत विद्यार्थी, औसत दर्जे के वकील रहे और उनकी भाषण देने की योग्यता को औसत से भी कम आंका जा सकता है । अपनी आत्मकथा में वे इस बात को स्वयं कई प्रसंगों में अलग अलग तरीके से कहते हैं । जो विशेषताएं उन्हें विलक्षण बनाती हैं उनमें जो मुझे सर्वाधिक प्रभावित करती है वो है उनकी जीवन-दृष्टि । यह दृष्टि व्यापक है, स्पष्ट है और व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख है । इसकी विशिष्टता का कारण यह है कि इस जीवन-दृष्टि को उन्होने किसी किताब,व्यक्ति या विचार से उधार नहीं लिया था । महात्मा गांधी को यदि समग्रता से जानने का प्रयास करेंगे तो हम पाएंगे कि यह जीवन दृष्टि उनके अपने आत्मविश्लेषण, आत्मसंधान और आत्मबोध से विकसित हुई । इसलिए महात्मा गांधी के जीवन में देश की स्वतंत्रता के भी अर्थ सदैव व्यापक रहे हैं । यह कहा जा सकता है कि उनका प्राथमिक उद्देश्य मानव-कल्याण से जुड़ा है जिसके लिए वे विभिन्न प्रकार से अलग अलग स्तर पर प्रयास करते हैं लेकिन वे किसी भी स्तर पर वे अपनी मूल दृष्टि से विमुख नहीं होते।
वे किसी राजनीतिक सभा में होने के समय, किसी पार्टी बैठक में होने के समय या जेल में होने के समय अपनी इस दृष्टि से पल भर भी दूर नहीं होते । इसी दृष्टि के कारण वे नेताओं और संगठनों पर निर्भरता में बंटे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को एक जन-आंदोलन बनाने में सफल हुए । यह जीवन दृष्टि ही नहीं बल्कि इस दृष्टि के प्रति दृढ संकल्प शक्ति ने मोहनदास को महात्मा बनाया । इसी दृष्टि से उन्होने सर्वप्रथम सत्य को पूर्ण रूप से जीवन का आधार बनाया और फिर अहिंसा-दर्शन को अंगीकार कर सत्याग्रह का महान विचार विश्व को दिया । गांधी को महात्मा के रूप में समझने के लिए हमें उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन से अलग एक दार्शनिक और नेतृत्वकर्ता के रूप में देखना होगा । इस बात को स्पष्ट करने के लिए उनके तीन विचार एक स्वच्छता और दूसरा सर्वोदय, तीसरा स्वावलंबन का उल्लेख करना पर्याप्त होगा।
देश के तमाम नेता जिस समय अंग्रेजी शासन के अंत के लिए ही संघर्षरत थे उसी समय में महात्मा गांधी भारत के अंतिम व्यक्ति के कल्याण का विचार कर रहे थे । भारत गांवों का देश रहा है और स्वच्छता, सर्वोदय एवं स्वावलंबन के उनके अभियान के केंद्र में भी सदैव गांव ही रहे । मई 1936 के ‘हरिजन’ में उन्होंने लिखा- “हमें गांवों को अपने चंगुल में जकड़ रखने वाली जिस त्रिविध बीमारी का इलाज करना है, वह इस प्रकार है (1) सार्वजनिक स्वच्छता की कमी (2) पर्याप्त और पोषक आहार की कमी (3) ग्रामवासियों की जड़ता।” गांव और ग्रामीण जीवन के लिए वे कितनी संवेदनशीलता से सोच रहे थे इसका प्रमाण यह विचार है । वे जानते थे कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी यदि भारत का कल्याण करना है तो इस ग्राम इकाई का उत्थान आवश्यक है । इस उत्थान कार्य को वे किसी सरकार के माध्यम से नहीं बल्कि नागरिकों के अभियान के रूप में करना श्रेयस्कर समझते थे । बीसवीं सदी के पहले दशक में ही “हिंद स्वराज” जैसी संक्षिप्त पुस्तक में अपनी इस भारत के लिए अपनी मूल दृष्टि को व्यक्त करते हैं।
आज जब हम स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तब गांधी के 152 वें जन्मदिन पर हम गांधी की दृष्टि में वर्तमान भारत को देखने का प्रयास कर सकते हैं । जब हम गांधी की दृष्टि से वर्तमान का विचार करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे सात दशक बाद ही सही लेकिन स्वतंत्र भारत गांधी की मूल दृष्टि की आकंक्षाओं को पूरा करने के मार्ग पर चल निकला है । यह कोई भावुक विश्लेषण नहीं बल्कि तथ्यपरक तस्वीर है जिसका संकेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के पहले वर्ष में आई महात्मा की जयंती से ही दे दिया था । प्रधानमंत्री ने गांधी की ही दृष्टि भारत के नागरिकों के कल्याण के लिए स्वच्छता का मंत्र प्राप्त किया और उसको एक अभियान बनाया । गुजरात की भूमि से होने कारण महात्मा गांधी के साथ नरेंद्र मोदी का एक सहज जुड़ाव रहा और फिर जीवन की पवित्रता एवं आध्यात्मिक आधार ने उन्हें गांधी की मानव-कल्याण की दृष्टि के निकट पहुंचाया है । 2 अक्टूबर 2014 से शुरु हुए “स्वच्छ भारत मिशन” अभियान ने महात्मा के 150 वें जन्मदिन तक खुले में शौच से मुक्त भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने का सफल प्रयास हुआ । सौ मिलियन से अधिक शौचालय बने और शहर- गांव सब जगह स्वच्छता नागरिकों की प्राथमिकता बनी।
इसके बाद हम कह सकते हैं कि गांधी की सर्वोदय एवं स्वावलंबन से स्वराज की दृष्टि ने ही प्रधानमंत्री को प्रेरित किया शासन को समाज के अंतिम व्यक्ति तक ले जाने के लिए । इसी सर्वोदय दृष्टि का क्रियान्वयन जनधन एवं उज्जवला जैसे अभियानों में दिखता है । स्वतंत्रता के सात दशक बाद यह संभव हुआ कि भारते केप्रत्येक नागरिक का अपना बैंक खाता हो और उसमें बिना किसी भ्रष्टाचार के सरकार द्वारा जदी जाने वाली राशि पहुंच सके । इसी प्रकार भारत की मातृशक्ति की परेशानियों को दूर करने तथा पर्यावरण के प्रति चेतना का सफल कार्यरूप दिखाई देता है उज्जवला योजना में जिसमें यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि देश की प्रत्येक की रसोई में एलपीजी गैस से चूल्हा जलना चाहिए ना कि केरोसीन और लकड़ियों से । महात्मा गांधी की महानता को प्रचारित करने के अभियान तो बहुत हुए किंतु उनके भारत कल्याण के लिए सुजाए गए विचारों पर कार्यान्वयन के अभियान अपेक्षित सफलता के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ही संभव हो पाए हैं । गांधी को चरखा कातते हुए दिखाकर ना जाने कितने वैचारिक आंदोलन चले किंतु उस तस्वीर से निकले स्वावलंबन के संदेश को अभियान बनाया है वर्तमान प्रधानमंत्री ने । मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया और अब आत्मनिर्भर भारत एक – एक कदम महात्मा की स्वावलंबी भारत को देखने की आकांक्षा की पूर्ति की दिशा में चल रहे महत्वपूर्ण कार्यक्रम हैं ।
आत्मनिर्भरता का विचार सबसे पहले गांधी ने ही स्पष्टता से व्यक्त किया था । “हरिजन सेवक” नामक पत्र के 2 अगस्त, 1942 के अंक में उन्होंने ‘ग्राम-स्वराज्य’ की बात करते हुए लिखा- ‘‘ग्राम-स्वराज्य की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा, जो अपनी अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर नहीं करेगा; और फिर भी बहुतेरी दूसरी जरूरतों के लिए- जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा- वह परस्पर सहयोग से काम लेगा”।
महात्मा की इसी दृष्टि से प्रेरणा लेकर प्रधानमंत्री ने भी आत्मनिर्भर भारत का मंत्र दिया है ।महात्मा गांधी की महान दृष्टि एवं भारत कल्याण की आकांक्षाओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कर्तव्य रूप में परिणित कर कृतज्ञ राष्ट्र उनको सच्ची श्रद्धांजलि दे रहा है।
डॉ. मार्केण्डेय आहूजा
कुलपति, गुरुग्राम विश्वविद्यालय, गुरुग्राम





