जयपुर : देश-विदेश में इमाम हुसैन की शहादत की याद में हर वर्ष निकाले जाने वाला मुहर्रम का जुलूस इस बार लगातार दूसरे वर्ष कोविड-18(कोरोना )की तीसरी लहर की आशंका के कारण नहीं देखा जा सकेंगा।विशेष कर राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगरी जयपुर के कलात्मक और सोने-चाँदी के ताजियों को देखने से जयपुरवासी और देशी-विदेशी पर्यटक इस वर्ष भी महरूम रहेंगे।
राजस्थान में मोहर्रम के त्यौंहार पर इस वर्ष 20 अगस्त शुक्रवार को मुस्लिम समाज ने कोरोना वायरस की विश्वव्यापी महामारी को देखते हुए एक बड़ा फैसला लिया है जिसके अनुसार इस बार लगातार दूसरे वर्ष ताजियों का जुलूस नहीं निकाला जाएगा हालाँकि मुहर्रम के मौके पर निकलने वाले ताजियों को बनाने का काम जयपुर शहर परकोटे समेत अन्य जगहों पर समय पर पूरा कर लिया गया है।
मुस्लिम धर्मगुरुओं ने कोरोना की गाइड लाइन की पालना करने को लेकर लोगों से अपील की है कि वे सरकार और प्रशासन की गाइड लाइन की पूर्णतया पालना करें।
जयपुर के ताज़िये अपने कलात्मक स्वरूप और खूबसूरत बनावट के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यदि यह कहा जाएँ कि देश में सबसे सुन्दर ताज़ियें जयपुर में बनते है तो इसे अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं माना जाना चाहिए।यहाँ ताजियेदार सालभर मेहनत करके खूबसूरत ताजिये तैयार करते हैं ताकि मुहर्रम की 10 तारीख को इमाम हुसैन की शहादत की याद में ताजिये निकाल कर खिराजे अकीदत पेश की जा सके। अपनी वास्तु और नगर नियोजन कला के लिए दुनिया भर में मशहूर गुलाबी नगरी जयपुर देश में अकेली ऐसी नगरी है जहां सोने-चांदी के ताजिये मोहर्रम को हर वर्ग का एक विशेष त्यौंहार बनाते हैं। हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में अकीदत के फूल पेश करते हुए राजधानी जयपुर में पिछले 250 साल से यें ताजिये निकाले की परम्परा बदस्तूर चली आ रहीं हैं।इतिहासकारों और जानकारों के अनुसार एक बार जयपुर महाराजा सवाई रामसिंह बेहद बीमार हुए तो उनके सलाहकारों ने उन्हें ताजिये की मन्नत लेने का मशविरा दिया,तब उन्होंने दिल से मन्नत मांगी और अपनी मन्नत पूरी होने पर उन्होंने डेढ़ मण सोने-चांदी का ताजिया बनवाया।तब से इस ताजिये को हर साल मुहर्रम पर बाहर निकाला जाता है।बाद में इस ताजिये की तर्ज पर मोहल्ला महावतान और मोहल्ला जुलाहान ने भी सोने चांदी के ताजिये बनवाये।हालाँकि उनका वजन जयपुर दरबार के ताजिये से कम है।इन सभी ताजियों का प्रदर्शन prati वर्ष अन्य कलात्मक ताजियों के जुलूस के साथ किया जाता रहा है।इनकी खास सुरक्षा भी की जाती है, लेकिन इन्हें सुपुर्द-ए-खाक़ नहीं किया जाता है।
गुलाबी नगरी जयपुर जहां अपनी लाजवाब तहजीब और समृद्ध संस्कृति के लिए देशभर में जाना जाता है, वहीं यहां की गंगा-जमनी तहजीब भी लोगों के लिए एक मिसाल है।जयपुर के पूर्व राजपरिवार की ओर से सोने और चांदी के ताजिये मुहर्रम के मौके पर सिटी पैलेस से बाहर निकाले जाते हैं।इन्हें करबला के मैदान तक ले जा कर वापस इमामबाड़ों में रख दिया जाता है। जयपुर में ताजियों की अपनी खास पहचान है।जयपुर में हिरनवालानं, गिलजार मस्जिद, मच्छजीवालान, पंनिगरानं, हन्दीपुरा, नीलगरान, सिकिगरान, माहवतान, जुल्हांन, सरायवाले, तोपखाना के साथ ही 400 से अधिक ताजिये निकाले जाते हैं ।इनमें सोने चाँदी के साथ ही चीनी बुर्ज का ताजिया और तवायफों के ताजिये बेहद खूबसूरत होते है,जोकि लोगों के आकर्षण का केन्द्र रहते आएँ हैं।
उल्लेखनीय है कि मुहर्रम माह में हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद किया जाता है।इसलिए जयपुर में बरसों से ताजिये बनाकर उनका प्रदर्शन किया जाता रहा है।बाद में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक कर दिया जाता है।मुहर्रम का माह करबला में हजरत इमाम हुसैन के अपने परिवार के 72 सदस्यों व साथियों के साथ यजीद की फौज के साथ जंग करते हुए सच की खातिर भूखे प्यासे शहीद हो जाने के कारण जाना जाता है।यही कारण है कि इस माह में मुस्लिम समाज के हर घर में हजरत हुसैन की शहादत को याद किया जाता है और उनकी शहादत की याद में अकीदत के फूल पेश करने के लिए जयपुर में ढाई सौ साल से ताजिये निकालने की परम्परा चली आ रही है।जयपुर में निकाले जाने वाले इन खास ताजियों में माहवतान, जुल्हांन, सरायवाले, तोपखाना, सिटी पैलेस से निकलने वाले ताजिये सोने चांदी के बने हैं।महवतान का ताजिया जयपुर दरबार से निकलता था।1868 से यह ताजिया निकल रहा है. इसके बाद कारीगर इसको महवतान के नाम से निकालते है।तोपखाना में भी सोने-चांदी का ताजिया है जोकि बहुत ही खूबसूरती से बनाएँ गयें है।
दरबार का ताजिया
देश के अन्य भागों की तरह राजस्थान के विभिन्न भागों में ताजिये निकालने का दस्तूर सैकड़ों वर्षों से निभाया जाता है।प्रदेश के हर अंचल में मुहर्रम का त्यौंहार मनाने की अपनी अलग अलग और अनूठी परम्पराएँ है ।
दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर संभाग के वागड़ अंचल के ऐतिहासिक नगर डूंगरपुर में रियासत काल से ही साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा नजारा देखने को मिलता है। डूंगरपुर में आज भी वर्षों पुरानी परम्पराओं का निर्वहन करते हुए दरबार का (पूर्व शासक) का ताजिया निकाला जाता है। डूंगरपुर के अन्तिम शासक और राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष रहें महारावल लक्ष्मण सिंह साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता के प्रतीक थे। वे स्वयं ताजियों और हिन्दुओं की राम रवाडी और जैनियों के रथ के जुलूस में शरीक होते थे और हमेशा दृढ़ता पूर्वक कहते थे कि हिंदू मेरी एक आँख हैं तों मुस्लिम दूसरी आँख हैं।इसी प्रकार प्रदेश के अन्य हिस्सों जोधपुर बीकानेर कोटा उदयपुर अजमेर भरतपुर आदि संभागों में भी मुहर्रम का त्यौंहार बहुत ही शिद्दत के साथ मनाया जाता हैं।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एवं राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी के साथ ही जयपुर की प्रिंसेस और राजसमन्द की सांसद दीया कुमारी ने कहा है कि मोहर्रम का महीना सच्चाई, इंसाफ व नेक राह पर चलने वाले हजरत इमाम हुसैन एवं उनके साथियों की शहादत की याद दिलाता है।
मोहर्रम के मौके पर अपने पैगाम में उन्होंने कहा कि मैदान ए कर्बला में हक के लिए हजरत इमाम हुसैन ने अपने साथियों के साथ अपनी जान दे दी, लेकिन अन्याय के आगे सर नहीं झुकाया। उनके ए उसूल सभी के लिए प्रेरणादायी है।





