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राजेश पायलट से जन-जन की आत्मीयता ऐसी की, उस शाम घरों मेें चूल्हे तक नहीं जले

@ विमलेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, जयपुर

जयपुर: 11 जून 2000 की वह मनहूस शाम थी जिसने राजनीति के एक उदयमान नक्षत्र को लील लिया। पूर्व केन्द्रीय मंत्री राजेश पायलट का आकर्षक व्यक्तित्व और लोगों से जुड़ाव ऐसा था कि पायलट की सड़क दुर्घटना में मृत्यु का समाचार जिसने भी सुना फूट-फूट कर रोए बिना नहीं रह सका। उनके निर्वाचन क्षेत्र दौसा में तो ऐसा मातम पसरा कि हजारों घरों में उस शाम का चूल्हा भी नहीं जला।

भड़ाना के पास हुए इस विभत्स हादसे के बाद जब उन्हें जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल लाया गया तो वहां भी पूरा अस्पताल मार्ग लोगों से अट गया। डॉक्टरों ने जैसे ही पायलट को मृत घोषित किया तो अस्पताल के चारों तरफ भी रूदन ही सुनाई देने लगा। लोग अपने आपको संभाल नहीं पा रहे थे।

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21 साल गुजर गए लोग आज भी नहीं भूल पाए

जो केवल पायलट के बारे में जानते थे या उनके बारे में सुन रखा था वे भी अपने आपको रोक नहीं पाए। पायलट के संघर्ष, चुनौती, उपलब्धि, बगावत, अदावत और फिर मौत की कहानी ही कुछ ऐसी है कि अब भी जब उस घटना और हादसे की चर्चा होती है तो आंखे नम हो जाती है। दौसा के पास हुए हादसे को 21 साल गुजर गए पर पायलट को जानने वाले लोग उन्हें अभी भी भुला नहीं पाए हैं।

राम-राम सा

लोगों की स्मृतिपटल पर पायलट अपने नाम की अमिट छाप छोड़ गए। राजेश पायलट ही ऐसे नेता थे जो देशी लहजे में “राम-राम सा” से जनता का अभिवादन और आभार प्रकट करते थे। राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट भी पिता की तरह “राम-राम सा” ही बोलते हैँं। वे सही मायने में जन नेता थे। दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलनकारियों के बीच हुक्का गुडग़ुड़ाना और खाट पर बैठ पंचायत करना। राजेश पायलट बचपन से ही इन्हीं संस्कारों में पले थे।

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जिंदगी का सबसे विभत्स दिन

दुर्घटना के दिन पायलट के साथ गाड़ी में सवार कांगेस नेता रामजीलाल ओढ बताते है कि वह जिंदगी का सबसे विभत्स दिन था, जब सैंथल में कार्यक्रम के बाद राजेश पायलट के साथ वे खुद व महेन्द्र मीणा कार से जयपुर जा रहे थे जहां से पायलट को फ्लाइट पकड़ दिल्ली जाना था, लेकिन अनहोनी को टाला नहीं जा सका और पायलट साब हमसे हमेशा के लिए विदा हो गए।

आंखों के सामने चला जाना आज भी अखरता है

जब हम गाड़ी में जयपुर की तरफ आगे बढ़ रहे थे तब राजनीति पर चर्चा चल रही थी। पायलट खुद कार चला रहे थे और हम दोनों उनके साथ आगे की सीट पर बैठे थे। अचानक रोडवेज बस ने ओवरटेक किया और टक्कर मार दी। राजेश पायलट को अस्पताल पहुंचते ही चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया। मै और महेन्द्र मीणा भी घायल हुए और लम्बे उपचार के बाद घर पहुंचे। पायलट का अचानक आंखों के सामने चला जाना आज भी अखरता है।

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अपूरणीय क्षति

सैंथल के कार्यक्रम में रामनाथ राजोरिया भी थे। वे अपनी गाड़ी लेने के लिए दौसा उतर गए। इस कारण राजोरिया पायलट के साथ दुर्घटना का शिकार होने से बच गए। राजोरिया राजेश पायलट के साथ की स्मृतियों को ताजा करते हुए बताते है कि राजेश पायलट के रूप में हुई अपूरणीय क्षति की पूर्ति नहीं की जा सकती। सिकराय से पूर्व विधायक महेन्द्र मीणा तो इस हादसे से अभी तक भी पूरी तरह नहीं उभर पाए हैं।

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उनका कोई सानी नहीं था

राजेश पायलट का यूं चला जाना केवल दौसा, भरतपुर आदि को ही नहीं अखरा। देश की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले व अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके राजेश पायलट की आज पूरे देश को कमी महसूस होती है। उनका कोई सानी नहीं था। वह सरल सहज थे। दौसा तो उनकी कर्मस्थली के साथ निर्वाण स्थली भी बन गया। दौसा की तरह उनका जुड़ाव भरतपुर के लोगों से भी था, भले ही भरतपुर छोड़ उन्हें दौसा आना पड़ा हो। यहीं कारण था कि राजेश पायलट दौसा व भरतपुर के लोगों को प्रथम वरियता में रखते थे।

राजेश पायलट

हजारों युवाओं को रोजगार दिलवाया

पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. राजेश पायलट अपने निर्वाचन क्षेत्र के युवाओं के रोजगार को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित रहते थे। उनके पास जो भी युवा जाता वे उसकी मदद जरूर करते। बेरोजगारों को रोजगार दिलवाने के लिए तो पायलट ने अपने यहां एक पूरी टीम तैनात कर रखी थी। इस टीम का काम ही केवल निर्वाचन क्षेत्र से रोजगार के लिए आए युवाओं के रजिस्टर संधारण करना तथा जब वैंकसी आए तो उसे सूचित कर उसमें फार्म भरवा यथा योग्य मदद करना। रोजगार के मुद्दे पर पायलट ने कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी। यहीं कारण था कि उस समय हजारों युवा उनके प्रयासों से रोजगार पा सके।

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कोई भी निराश ना लौटे

पायलट की एक खास बात यह भी थी कि उनसे मिलने कोई दिल्ली जाता तो उसे वे भूखा नही लौटने देते थे। यहां तक की बस में बैठाकर दौसा तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उठाते थे। दौसा के लोग भी साफ- सफाई जैसी छोटी शिकायत लेकर भी दिल्ली पहुंच जाते थे, लेकिन वे कभी बुरा नहीं मानते थे। वरिष्ठ पत्रकार पदमसिंह भाटी के सुपुत्र सुधीर भाटी बताते है कि कोई नंगे पांव आ गया तो उसे पायलट साब ने जूते-चप्पल पहनाकर ही भेजा। उनका सपना था कि निर्वाचन क्षेत्र तथा उनके यहां उम्मीद लेकर आने वाला कोई भी निराश ना लौटे। इसके लिए ही उन्होंने जय जवान, जय किसान ट्रस्ट बनाया था।

पत्रकारों से भी मधुर संबंध

जयपुर के पत्रकारों में उन दिनों नवज्योति में कार्यरत पदमसिंह भाटी ही सबसे निकट थे। उनके जयपुर या राजस्थान ही नहीं देश के किसी भी भाग में दौरे की जानकारी भाटीजी के पास रहती थी। पायलट कई बार अपनी पूर्वोत्तर की यात्रा में भाटीजी को साथ भी लेकर गए थे। पत्रकारों से पायलट के अच्छे संबंध थे। उस जमाने में लैण्ड लाइन फोन कनेक्शन की बड़ी अहमियत थी। पायलट ने लोगों को फोन उपलब्ध करवा संचार क्रांति से जोड़ डाला।

क्रमशः…2 

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