@ विमलेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, जयपुर
जयपुर। पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेश पायलट लोगों से मिलने जुलने में तो इतने सहज रहते थे कि उन्हें देख लगता ही नहीं था कि देश के चुनिंदा नेताओं में से एक के पास हम खड़े हैं। दौसा में तो जीप चलाते-चलाते उनकी इच्छा होती कि इस गांव में चलना चाहिए वे गाड़ी घूमा बिना किसी कार्यक्रम के वहां पहुंच जाते थे। अपने नेता को अचानक चौपाल पर पाकर लोग खुशी से लबरेज हो जाते थे।
जमीन पर लोगों के बीच बैठ लोगों से बतियाते राजेश पायलट को देख ग्रामीण भी संकूचा जाते थे। लोग कुर्सी वगैरह लेकर आते और उनसे बैठने का आग्रह करते तो वे ये ही कहते थे कि जमीन से जुड़ा हुआ हूं जमीन पर थोड़ी देर तो बैठने दो सुकून से। राजेश पायलट चुनाव प्रचार से आकर दौसा में पिंकी सरदार के ढाबे पर ही खाना खाते थे। ये ढ़ााबा पायलट के कारण आज भी फेमस है। सचिन पायलट ने भी दौसा से चुनाव लड़ा तो इसी ढ़ाबे को अपने खाने का कैंप रखा।
सर्वसमाज के नेता थे
पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेश पायलट ने अपनी राजनीतिक यात्रा की, शुरुआत 1980 में राजस्थान से ही की थी उसके बाद वे राजस्थान के ही होकर रह गए। सबसे पहला चुनाव उन्होंंने भरतपुर से लड़ा और जीते। उसके बाद वे दौसा आ गए और यहां से 5 चुनाव जीते। वे सभी समुदाय के लोगों में अपनी पैठ रखते थे। यहीं उनकी जीत का बड़ा कारण था। उनके सामने जातीय समीकरण भी फैल हो गए,क्योंकि सर्वसमाज उन्हें अपना मानता था। उनमें अपनापन भी कूट-कूट कर भरा था।

राजेश्वर से राजेश पायलट
गगनचुंबी आसमां में हवाई जहाज उड़ाने वाले राजेश्वर सिंह ने कभी सोचा नहीं था वे एक दिन राजेश पायलट के तौर पर सियासी बुलंदियों को भी छुएंगे। सबसे अहम बात यह है कि राजेश्वर सिंह से राजेश पायलट राजस्थान में आकर ही बने। भरतपुर में अपना नामांकन दाखिल करने से पहले कचहरी गए और हलफऩामा दे कर अपना नाम बदलवाया। इस प्रकार वायुसेना में राजेश्वरसिंह के नाम से नौकरी करने वाले राजनीति में आकर राजेश पायलट बन गए।

इंदिरा जी,संजय गांधी और राजीव गांधी सभी के चेहते थे
भरतपुर से पहला टिकट संजय गांधी ने दिया था। संजय गांधी के बाद वे राजीव गांधी के अभिन्न मित्र बन गए। दो पायलटों में ये दोस्ती काफी परवान चढ़ी और राजीव गांधी जब तक थे तब तक पायलट उनके निकटवर्ती लोगों में रहे। राजीव गांधी के कार्यकाल में ही वे पहली बार मंत्री बने। इंदिराजी से भी उनके ऐसे रिश्ते हो गए थे कि लगता ही नहीं था कि राजनीति में कोई नया खिलाड़ी आया है।

उनका यूं चला जाना सताता हैं
पायलट राजीव गांधी और फिर पीवी नरसिंहा राव की सरकार में भूजल परिवहन, संचार, सूचना एवं प्रसारण तथा आंतरिक गृह विभाग के मंत्री रहे। ये भी एक संयोग ही था कि राजेश्वर सिंह जिन कोठियों में दूध देते थे उन्हींं में से एक कोठी में वे मंत्री के रूप में रहे। मात्र 55 वर्ष की उम्र में इस दुनियां को अलविदा कर देना उनके राजनीतिक कौशल को जानने वाले हर किसी को उनका यूं चला जाना सताता हैं।
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पायलट परिवार और दौसा
11 जून, 2000 को राजेश पायलट को खो देने के बाद दौसा से लोकसभा उपचुनाव में राजेश पायलट की धर्मपत्नी रमा पायलट चुनाव जीतकर सांसद बनी। 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने दौसा से सचिन पायलट को टिकट दिया तथा यहीं से उनकी राजनीति की शुरुआत हुई। करीब 26 साल की युवावस्था में सांसद बनने वाले सचिन को परिसीमन के कारण दौसा से अजमेर जाना पड़ा,वर्ना पायलट परिवार की तो दौसा ही कर्मभूमि बनी हुई थी।

हालांकि सचिन पायलट का दौसा से लगाव आज तक वैसा ही है, जैसा पायलट के समय था। सचिन पायलट का दौसा से जुड़ाव का यह आलम है कि जब भी वे दौसा होकर गुजरते हैं तो बिना दौसा ठहरे आगे नहीं जाते। दस मिनट में उनके आने की सूचना पर भी जिलेभर में हाईवे पर जगह-जगह सैकड़ों कार्यकर्ता जमा हो जाते हैं। पिता की तरह सचिन भी एक-एक को शक्ल से पहचान कर हाल-चाल जरूर पूछते हैं।
झोली भरकर दिया भी दौसा ने
राज्य विधानसभा चुनाव प्रचार में जब सचिन पायलट दौसा आए तो सभा के दौरान कहा कि उन्हें दौसा जिले से एक-दो सीट नहीं बल्कि पूरा पैकेज चाहिए। दौसा में उनके प्रति लगाव का इससे पता लगता है कि उनके चाहने वालों ने पायलट के पैकेज की बात को सच साबित कर दिखाया। दौसा की पांच में से चार सीट कांग्रेस की झोली में आई तथा निर्दलीय ओमप्रकाश हुड़ला भी हाल ही में उनके साथ नजर आए थे।

सफरनामा
- राजेश पायलट का जन्म 10 फरवरी 1945 को गाजियाबाद के पास वैदपुरा गांव में
- दिल्ली में चचेरे भाई के साथ लुटियंस की कोठियों में दूध की सप्लाई
- पढ़ाई के बाद वायुसेना में, सेना में पायलट के कारण ही पायलट कहलाए
- 1980 में भरतपुर से पहला चुनाव और संसद पहुंचे
- कर्मस्थली बनाया दौसा को, दौसा को देश के राजनीतिक मानचित्र पर पहचान दिलाई
- दौसा का पायलट परिवार ने सात बार लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया।
- राजीव गांधी की सरकार में अहम ओहदों पर रहे
- भूतल परिवहन, सूचना प्रसारण, गृह महकमें को संभाला
- पीवी नरसिंहाराव सरकार में भी मंत्री रहे
- गृह रक्षा राज्यमंत्री के तौर पर कश्मीर समस्या समाधान पर काम किया
- देश के डाक घरों को अत्याधुनिक बनाने में योगदान अविस्मरणीय था
- कांग्रेस संगठन में आंतरिक लोकतंत्र की आवाज बुलंद की

- इतने बड़े नेता थे लेकिन छोटे से छोटे कार्यकर्ता का रखते थे मान
- कार्यकर्ता और समर्थकों के नाम तो जैसे उन्हें रटे थे
- देहात की राजनीति उन्हें प्रिय थी,वे प्राय: गांव और किसान की ही बात किया करते थे
- साल 2000 की 11 जून को दौसा के समीप भंड़ाना में सड़क दुर्घटना में निधन
