PM Modi ‘ओडिशा इतिहास’ किताब के हिंदी अनुवाद का विमोचन करेंगे

-"ओडिशा इतिहास" डॉ. हरेकृष्ण महताब की सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली किताबों में से एक है

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार, 9 अप्रैल को ‘उत्कल केसरी’ हरेकृष्ण महताब की तरफ से लिखी गई किताब ‘ओडिशा इतिहास का हिंदी अनुवाद जारी करेंगे. प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी एक बयान के मुताबिक, हरेकृष्ण महताब फाउंडेशन की ओर से अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित किए जा रहे एक समारोह के दौरान पीएम मोदी इस किताब का विमोचन करेंगे.

‘ओडिशा इतिहास’ डॉ. हरेकृष्ण महताब की सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली किताबों में से एक है. ये किताब ओड़िया और अंग्रेजी भाषा में पहले से ही उपलब्ध है और इसका हिंदी अनुवाद शंकरलाल पुरोहित ने किया है. इससे पहले पीएम मोदी मार्च महीने में स्वामी चिद्भवानंदजी की भगवद गीता का किंडल वर्जन लॉन्च और इससे भी पहले भगवद गीता के श्लोकों पर 21 विद्वानों की टिप्पणियों वाली पांडुलिपि के 11 खंडों का विमोचन कर चुके हैं.

हरेकृष्ण महताब ने जेल में लिखी थी ये किताब

हरेकृष्ण महताब एक स्वतंत्रता सेनानी थे और वह ओड़िशा के पहले मुख्यमंत्री भी थे. वह 1946 से 1950 तक ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे. वह संविधान सभा के सदस्य और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बड़े राजनेताओं में से एक थे. उन्हें लोकप्रिय उपाधि ‘उत्कल केसरी’ के नाम से जाना जाता है. स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी. वह 1942 से 1945 तक लगभग दो साल अहमदनगर फोर्ट जेल में बंद रहे और उसी दौरान उन्होंने ओडिशा के इतिहास पर आधारित यह किताब लिखी और साल 1948 में ‘ओडिशा इतिहास’ का ओडिया एडिशन प्रकाशित किया.

ओडिशा के इतिहास के बारे में क्या कहती है ये किताब

इस किताब में ओडिशा के इतिहास के बारे में बताया गया है. वर्तमान ओडिशा राज्य तीन प्रदेशों औड्र, उत्कल और कलिंग के मिलने से बना है जिसका विस्तार प्राचीन काल में शबरों की भूमि से शुरू हुआ और फिर द्रविड़ और आर्य सभ्यता के प्रभाव से पैदा हुई नई सभ्यता के रूप में हुआ. इसमें कहा गया है कि द्रविड़ भाषा में ‘ओक्वल’ और ‘ओडिसु’ शब्द का मतलब ‘किसान’ है. कन्नड़ भाषा में किसान को ‘ओक्कलगार’ कहते हैं. मजदूरों को तेलगु भाषा में ‘ओडिसु’ कहा जाता है. इन ‘ओक्कल’ और ‘ओडिसु’ शब्दों से आर्यों ने संस्कृत में ‘उत्कल’ और ओड्र’ शब्द बनाए.

इस किताब में बताया गया है कि चंद्रगुप्त मौर्य (322 ई. पू.) की राजसभा में यूनानी राजदूत मेगास्थनीज की तरफ से भारत के बारे में वर्णन और इतिहासकार प्लीनी की ओर से भारत के भूगोल के बारे में किए गए जिक्र के अनुसार, कलिंग की सीमा उत्तर में गंगा, दक्षिण में गोदावरी, पश्चिम में पर्वतमाला और पूर्व में समुद्र है. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ‘ओड्र’ के बारे में लिखा कि इसकी सीमा 1,167 मील थी और दक्षिण पूर्व में समुद्र स्थित था. इस किताब में कहा गया है कि गंगा के मुहाने पर पुंज द्वीप भी कलिंग साम्राज्य के तहत आते थे. बाद में उनमें बार-बार बदलाव हुए.

उत्कल राज महानदी तक और कलिंग राज्य गोदावरी तक फैला था. बीच में कलिंग राज्य में दो राजवंशों के बीच संघर्ष के कारण पुरी और गंजाम जिलों को मिलाकर नया राज्य बना. ‘ओडिशा इतिहास’ किताब के अनुसार, “आगे चलकर उत्कल और कलिंग एक हो गए. इसके बाद दोनों की भाषा, स्वर और लिपि भी एक हो गए.” किताब के पहले अध्याय (First chapter) में ‘ओडिशा का जन्म’ शीर्षक के तहत कहा गया है कि लंबे समय तक दोनों (उत्कल और कलिंग) एक ही शासन के अधीन रहे. लेकिन बाद में जीवन संघर्ष में कलिंग गोदावरी तक अपनी सीमा नहीं रख सका और उत्कल भी उत्तर में अपनी सीमा सुरक्षित न रख सका.

किताब के दूसरे चैप्टर में राज्य के बहुत पुराने इतिहास को लेकर कहा गया है कि भारत के अन्य प्रदेशों के प्राचीन इतिहास की तरह ओडिशा का इतिहास भी वैदिक काल से शुरू होता है. इसमें कहा गया है कि वेदों में कहीं भी कलिंग, उड्र या उत्कल का नाम नहीं मिलता है. इसके बाद ‘ब्राह्मण साहित्य’ के युग में ओडिशा के किसी क्षेत्र का नाम नहीं मिलता है. कुछ विद्वानों का मानना है कि ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में कलिंग राजा का जिक्र है. इसी के साथ, महाभारत काल में 1100 ई. पू. में कलिंग की राजधानी राजपुरी का जिक्र मिलता है. उस काल में कर्ण, दुर्योधन के चित्रांगदा के स्वयंवर में जाने और दुर्योधन की ओर से कर्ण की ओर से उत्कलियों को हराने का जिक्र किया गया है.

 

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