नई दिल्ली: भारत में ऊर्जा कुशल यानी बिजली की कम खपत करने वाले पंखों का संभावित सालाना बाजार 12 हजार करोड़ रुपये तक हो सकता है। आवासीय क्षेत्र में ऐसे ऊर्जा कुशल पंखों के लिए उपयुक्त कुल बाजार लगभग 1.42 लाख करोड़ रुपये (20 बिलियन अमेरिकी डॉलर) होने का अनुमान है। वर्तमान में, आवासीय क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले पंखों में सुपर-एफिशिएंट फैन का हिस्सा सिर्फ तीन प्रतिशत है। ये जानकारियां काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) की ओर से आज जारी किए गए एक स्वतंत्र अध्ययन ‘बिजनेस मॉडल्स फॉर स्केलिंग अप सुपर एफिशिएंट एप्लायंसेज’ से सामने आई हैं।
घरेलू उपभोक्ता सुपर-एफिशिएंट पंखों को अपनाकर 500 रुपये बचा सकता है
इस रिपोर्ट ने रेखांकित किया है कि पारंपरिक सीलिंग पंखों की जगह ऊर्जा-कुशल पंखों का इस्तेमाल भारत को अपने सालाना उत्सर्जन में 330 लाख टन कार्बन डाई-ऑक्साइड के बराबर कमी लाने और बिजली खर्च घटाने में मदद कर सकता है। इतना ही नहीं, अगर सब्सिडी आधारित बिजली पाने वाले घरों में पंखों की जगह पर ऊर्जा कुशल पंखों को लगा दिया जाए तो पांच वर्षों में अकेले उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार को 1500 करोड़ रुपये और बिजली वितरण कंपनियां को 250 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। इसके अलावा, एक औसत घरेलू उपभोक्ता सुपर-एफिशिएंट पंखों को अपनाकर सालाना प्रति पंखा 500 रुपये बचा सकता है। इससे उसे महज छह वर्षों में पंखो को खरीदने की लागत के बराबर की बचत हो जाएगी, जो कि पंखे की 10-15 वर्षों की अवधि (टेक्निकल लाइफ) से काफी कम है।
जीएसटी दरों में कटौती होनी चाहिए
डॉ. अरुणभा घोष, सीईओ, CEEW ने कहा, “ऊर्जा दक्षता के लिए भारत का सफर घर से शुरू होता है। जैसे-जैसे परिवार पंखों को खरीदने के लिए आगे आते हैं, उसके हिसाब से हमें यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि सुपर-एफिशिएंट पंखे ज्यादा किफायती हों और सहजता से उपलब्ध हों। इसको संभव बनाने के लिए, जीएसटी दरों में निश्चित तौर पर कटौती होनी चाहिए। इसके साथ, आवासीय उपभोक्ताओं को सुपर-एफिशिएंट उपकरणों के इस्तेमाल से खर्च में आने वाली बचत के बारे में भी जागरूक किया जाना चाहिए। अंत में, ऊर्जा कुशल उपकरणों के अंतिम छोर तक वितरण और सर्विसिंग नेटवर्क की उपलब्धता में सुधार किया जा सकता है।”
इस अध्ययन ने यह भी बताया है कि देश भर में सुपर-एफिशियंट पंखों का इस्तेमाल सीमित होने के प्रमुख कारणों में इसकी ऊंची कीमत, उपभोक्ताओं के बीच कम जागरूकता और उपलब्धता में कमी शामिल हैं। इसके अलावा, कीमत ज्यादा होने से ऊर्जा कुशल उपकरणों का इस्तेमाल सिर्फ उच्च आय वाले परिवारों तक ही सीमित है।
CEEW की सीनियर प्रोग्राम लीड शालू अग्रवाल ने कहा, “भारत एक मददगार इको-सिस्टम के माध्यम से ऊर्जा दक्षता के क्षेत्र में अपनी नेतृत्व क्षमता को प्रदर्शित कर चुका है। ऐसे में थोक खरीद और मजबूत वितरण व्यवस्था वाला बिजनेस मॉडल ऊर्जा कुशल उपकरणों का उपयोग बढ़ाने में प्रभावी ढंग से मदद कर सकता है। जून 2022 से सीलिंग फैन के लिए स्टार लेबलिंग प्रोग्राम अनिवार्य तौर पर लागू हो जाएगा। इसलिए, यह ऊर्जा-कुशल सीलिंग फैन को बढ़ावा देने के लिए तेजी से कदम उठाने का सही समय है, जिसे ऊर्जा दक्षता पर अब तक की बहस में बहुत कम जगह मिल पाई है।”
CEEW के अध्ययन में यह सुझाव दिया गया है कि सरकारों को भारत में ऊर्जा कुशल पंखों को किफायती बनाने और उनकी उपलब्धता सुधारने वाले बिजनेस मॉडल और रणनीतियों को बढ़ावा देना चाहिए। यह भी सिफारिश की गई है कि ऊर्जा कुशल उपकरणों तक कम आय वाले उपभोक्ताओं की पहुंच बनाने के लिए उन्हें गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) और माइक्रोफाइनेंस संस्थानों जैसे वित्तीय संस्थानों से कर्ज और सहायता देने को अनिवार्य बनाना चाहिए।
सीईईडब्ल्यू अध्ययन को यूएस-इंडिया क्लीन एनर्जी फाइनेंस टास्क फोर्स के हिस्से के रूप में यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट के ब्यूरो ऑफ एनर्जी रिसोर्सेज से सहायता मिली थी।
अध्ययन के निष्कर्ष काफी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ऊर्जा-कुशल उपकरणों के उपयोग को बढ़ाना 2030 तक अर्थव्यवस्था में ऊर्जा सघनता (energy intensity) में 2005 के स्तर से 45 प्रतिशत कमी लाना भारत सरकार के लक्ष्य के केंद्र में है। उजाला योजना के तहत, केंद्र और राज्य सरकारें पहले ही पूरे देश में लगभग 37 करोड़ (370 मिलियन) एलईडी बल्ब वितरित कर चुकी हैं।


