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संवेदनशीलता और अपणायत की मिसाल अशोक गहलोत

जिलों

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कुशल नेतृत्व में राजस्थान सरकार के तीन वर्ष पूर्ण हो गए। मुख्यमंत्री के रूप में गहलोत की यह तीसरी पारी है। मुख्यमंत्री के अलावा सांसद, केंद्रीय मंत्री, संगठन में दो बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तथा राष्ट्रीय महामंत्री आदि राजनीति की इतनी लंबी यात्रा में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उनके तीनों कार्यकाल तमाम आलोचना-समालोचना के बावजूद मानवीयता की कसौटी पर खरे रहे हैं।

नए उभरते नेताओं के लिए मिसाल
राजनीति से इतर एक मानवीय और जमीन से जुड़े नेता के रूप में जो पहचान गहलोत ने बनाई है, वह नए उभरते नेताओं के लिए किसी मिसाल से कम नहीं है। हारी-बीमारी में मदद और दु:ख-दर्द बांटने में उनका कोई सानी नहीं। ऐसे सैंकड़ों किस्से होंगे, जिनमें मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक पारिवारिक सदस्य की तरह मदद की। उनके इस आत्मीय व्यवहार का हर कोई कायल है।

“देवदूत” गहलोत
ऐसा ही किस्सा मेरे जीवन से भी जुड़ा है। मेरे जीवन में गहलोत देवदूत बनकर आए। आज से ठीक 22 वर्ष पहले एक काली स्याह रात में मेरी माँ गोदावरी देवी को पैतृक गांव बिसाऊ से गंभीर अवस्था में जयपुर लाया गया था। उन्हें अचेतावस्था में पहले जनाना अस्पताल और फिर एसएमएस अस्पताल ले जाया गया। जांच में पता चला कि मां को लास्ट स्टेज का कैंसर है तो पैरों तले जमीन खिसक गई।

गहलोत प्रदान किया संबल
कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी का उपचार करवाना आसान नहीं था, लेकिन तब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सम्बल प्रदान किया। मां का जयपुर में करीब डेढ़ साल इलाज चला। इस दौरान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कॉटेज से लेकर दवा आदि की सम्पूर्ण व्यवस्था मुफ्त करवाई। गहलोत ने मुख्यमंत्री सहायता कोष से माँ के इलाज के लिए भरपूर फण्ड का आवंटन तो किया ही।

बाजार से भी दवा खरीदी गई
एसएमएसअस्पताल प्रशासन को निर्देश दिए कि इलाज में कोई कमी नही रहे। दवा अगर अस्पताल के स्टोर में उपलब्ध नहीं है तो बाजार से खरीदी जाए। इतना ही नहीं वे जब भी एसएमएस अस्पताल मे किसी वीआईपी या अन्य परिचित से मिलने आते मां गोदावरी देवी से मिले बिना नहीं जाते। गहलोत मां के बैड के पास बैठ कुशल क्षेम पूछने के साथ घर-परिवार के बारे में भी खूब चर्चा करते। मुख्यमंत्री मां से हंसकर ये जरूर पूछते- माताजी अब तो कोई तंग नहीं कर रहा।

अरे आप तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हो
मुख्यमंत्री की ओर से यह पूछे जाने के पीछे एक रोचक किस्सा है। गहलोत पहली बार जब मिलने आए तो मां ने साथ आए सुरक्षा कर्मियों को देखकर कॉटेज खाली करवाने वाले समझ आंखे मूंद ली थी। मुख्यमंत्री के आग्रह पर आंखें खोली तो अपने सामने प्रदेश के मुखिया को देख विस्मित रह गई और झटके से खड़ी हो घूंघट कर लिया और बोली-अरे आप तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हो। आपको तो टीवी पर देखा है। मुझे तो पुलिसवालों को देख डर लगा कि कहीं ये कॉटेज खाली करवाने तो नहीं आ गए। मुख्यमंत्री ने सारा माजरा जान एसएमएस अधीक्षक से कहा-माताजी जब तक रहे कॉटेज खाली नहीं करवाएं।

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मां बनी वीआईपी
इसके बाद मुख्यमंत्री की बार-बार विजिट से मां वीआईपी बन गई। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र चौधरी एवं माधोसिंह दीवान भी हॉस्पिटल आते तो माँ से मिलकर जरूर जाते। पूर्वमंत्री अश्क अली टाक की तो नियमित विजिट होती थी। किसी कारणवश अश्क अली जिस रोज नहीं आ पाते तो माँ पूछ ही लेती”भाया इश्कअली कौनी आयो”।

मां-बापूजी का आशीष
बाद में पिताजी गौरीशंकर शर्मा भी जांच में कैंसर पीड़ित पाए गए। उनका भी जयपुर में इलाज चला।दोनों को बचाया तो नहीं जा सका पर इलाज की समुचित व्यवस्था से प्रसन्न हो मां-बापूजी दोनों मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनकी सरकार को आशीष देकर गए।

एक फूटी कौड़ी भी नहीं लगी जेब से
बुर्जुगों के आशीष के अधिकारी हैं भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, क्योंकि कैंसर की बीमारी को लेकर कहा जाता था कि इस बीमारी के इलाज में जमा पूंजी तथा घर- परिवार सब कुछ बिक जाता है, जबकि गहलोत सरकार से मिले संबल के कारण मेरी जेब से मां-पिताजी के इलाज में एक फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं हुई। सरकार के साथ मित्रों ने भी भरपूर साथ दिया। इससे अच्छी खूबसूरत सरकार और समाज की क्या तस्वीर हो सकती है।

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पूरे प्रदेशवासियों को सौगात
संभवत: मेरे जैसे हजारों परिवारों की पीड़ा को ध्यान में रखकर ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने दूसरे कार्यकाल में नि:शुल्क दवा और स्वास्थ्य जांच योजना लागू की। तीसरे कार्यकाल में गरीब को इलाज की चिंता से मुक्त करने के लिए उन्होंने 5 लाख रुपये तक मुफ्त इलाज की “मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना” लागू की है। इस योजना से क्या गरीब, क्या अमीर सभी प्रदेशवासियों को जोड़ने की कोशिश की गई है।

मुसीबत के समय में गहलोत जिस भावना के साथ मददगार बनते हैं, ऐसा कोई बिरला ही करता है। उनकी सरकार का ध्येय वाक्य भी है संवेदनशील, पारदर्शी और जवाबदेह शासन। उनके इस महागुण की सर्वत्र प्रशंसा होनी भी चाहिए।
( यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि वास्तविकता है जिसे भुलाया नहीं जा सकता। )

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