जयपुर। गायत्री परिवार राजस्थान की ओर से नौ दिवसीय आओ गढ़े संस्कारवान पीढ़ी कार्यशाला का शनिवार को गर्भोत्सव संस्कार के साथ समापन हुआ। गायत्री चेतना केन्द्र दुर्गापुरा से उप जोन समन्वयक सुशील कुमार शर्मा ने गायत्री महामंत्र और गुरु वंदना के साथ नौंवे दिन की कार्यशाला का शुभारंभ किया। जूम एप और यू ट्यूब पर हुई कार्यशाला में प्रदेश भर से एक हजार प्रतिभागियों ने भागीदारी की।
शनिवार को कार्यशाला के आखिरी दिन शांतिकुंज हरिद्वार से ऋतु सिंह और सविता सिंह ने गर्भोत्सव संस्कार की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए आज के युग में इसके महत्व पर प्रकाश डाला। सैंकड़ों गर्भवती महिलाओं ने घर बैठे गर्भोत्सव संस्कार संपन्न किया। शांतिकुंज हरिद्वार से प्राप्त दिशा निर्देशों के अनुरूप क्रियाएं की गई। वेद मंत्रोच्चार के साथ गर्भवती महिलाओं को औषधि अवध्राण कराया गया। इसके अंतर्गत वट की जटा, गिलोय, पीपल की कौंपल से तैयार द्रव्य सुंघाया गया। साथ ही तीनों औषधियों के गुण गर्भस्थ शिशु में विकसित होने की भावना के साथ यह क्रिया संपन्न की गई।

वेदमाता गायत्री, गुरुसत्ता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर गायत्री मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र के साथ आहुति अर्पित की। आरती सहित अन्य धाार्मिक क्रियांए पूरी करने के बीच परिवार के सभी सदस्यों ने गर्भवती महिला पर पुष्प वर्षा कर आशीर्वाद दिया। साथ ही गर्भवती महिला का उचित माहौल, साधन-सुविध उपलब्ध करवाने का विश्वास दिलाया। इससे पूर्व गर्भवती महिलाओं ने श्रेष्ठ आहार विहार रखने का संकल्प लिया।
तीन माह में करवाएं पुसंवन संस्कार
ऋतु सिंह ने कहा कि आज संस्कारों का एक प्रकार से लोप हो गया है। इसके दुष्परिणाम सभी भुगत रहे हैं। गायत्री परिवार ने संस्कारों की पंरपरा को फिर से शुरू किया है। इसमें पुंसवन संस्कार भी शामिल है। सविता सिंह ने कहा कि गर्भ सुनिश्चित हो जाने पर तीन माह में पूरे हो जाने तक पुंसवन संस्कार कर देना चाहिए विलंब से किया जाए तो हर्ज नहीं है किंतु समय पर देने का लाभ विशेष होता है तीसरे माह से गर्भ में आकार और संस्कार दोनों अपना स्वरूप पकडऩे लगते हैं इसलिए उनके लिए आध्यात्मिक उपचार समय पर कर दिया जाना चाहिए।
आने वाला शिशु के माता-पिता, कुल, परिवार तथा समाज के लिए विडंबना न बने, अपने सौभाग्य और गौरव का कारण बने इसलिए गर्भस्थ शिशु के शारीरिक बौद्धिक तथा भावनात्मक विकास के लिए यह संस्कार करवाना बहुत जरुरी है। इससे जीव के पहले वाले संस्कारों का निवारण होकर नए संस्कारों की स्थापना होती है।
