Headlines

ये कैसा प्रोटोकॉल : सत्ता-संगठन की धुरी इनके इर्द-गिर्द ही क्यों घूमती है ?

जयपुर। कांग्रेस में संगठन से लोग क्यों दूर होते जा रहे हैं। इसके वैसे तो एक नहीं अनेक कारण हैं,पर सबसे बड़ा कारण जो सामने आया वह कुछ सौ लोगो का आभा मंडल व क्षत्रप है।

यह है सच्चाई

कांग्रेस संगठन के विभिन्न आयोजनों के भेजे जाने वाले परिपत्रों की संख्या से इस सच्चाई को जाना जा सकता है। जिन्हें वरीयता मिलती है वे है लोकसभा – विधानसभा के हारे-जीते उम्मीदवार। पार्टी संगठन में पदाधिकारी तक को महत्वपूर्ण निर्णयों से अलग ही रखा जाता है। कमोबेश सरकार के स्तर पर भी यही स्थिति है। प्रत्येक विधानसभा में हारे-जीते कांग्रेस उम्मीदवार ही मुखिया होते हैं। उनके कहने पर ही स्थानीय विकास के लिए बजट पास होता है और ये ही क्षेत्र में अधिकारी -कर्मचारी लगवाने के लिए अधिकृत होते हैं। यहां तक कि सरकार की तरफ से किए जाने वाले प्रमुख आयोजनों व भोज के आमंत्रण में भी प्रायः ये ही चेहरे देखने को मिलते है।

केवल प्रत्याशियों को वरीयता

प्रायः देखा गया है कि राजनीतिक नियुक्तियों में भी इन्हें ही वरीयता मिलती है, जबकि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में तीन से चार चेहरे ऐसे होते है जिन्हें सशक्त दावेदार स्वयं पार्टी मानती है उसके बावजूद केवल प्रत्याशी को ही सत्ता-संगठन की चाबी सौंपे जाने की परंपरा सी बन गईं है। कुछ सौ लोगों के आधिपत्य तथा गलत परम्परा ने संगठन को धरातल पर ला पटका है।

PCC Meeting

यह भी पढ़े : जब डोटासरा ही सत्ता का मोह नहीं छोड़ पा रहे तो बाकी क्यों माथा खपाए पार्टी में : पार्ट-1

इन्हें मान सम्मान, ठगा गया कार्यकर्ता

अब पूर्व विधायक व पूर्व सांसदों को ले तो उन्हें पेंशन के अलावा यात्रा भत्ता आदि सब मिलता है। जिले व उपखंड स्तर पर इन्हें सरकारी स्तर पर मान-सम्मान भी दिया जाता है। फिर भी नए चेहरे, जमीनी कार्यकर्ता को आगे आने का मौका तक नहीं मिल पाता। राजनीतिक नियुक्तियों में विशेष दर्जे वाले ये लोग ही बाजी मार जाते हैं और आम कार्यकर्ता ठगा सा देखता रह जाता हैं।

यह भी पढ़े : 7 साल बनाम 37 साल का झगड़ा, बचे कांग्रेसियों की कौन सुध ले : पार्ट-2
आम कार्यकर्ता को झेलनी पड़ती हैं शर्मिंदगी

आम कार्यकर्ता के तो तबादले-पोस्टिंग जैसे घर के काम तक नहीं होते। उन्हें तो उल्टे शर्मिंदगी का सामना करना अलग पड़ता है, क्योंकि सत्ता में आने से पहले वे लोगों से इतने वादे और दावे कर चुके होते हैं कि काम नहीं होने पर अपनों के बीच हास्य का पात्र बनकर रह जाते हैं।

मलाईदार पदों पर रहे अफसर ही क्यों

अब तक हुई गैर सरकारी नियुक्तियों को देखे तो मलाईदार पदों पर रहे अधिकारी राजनीतिक नियुक्तियों में भी प्रमुख पदों पर आकर बैठ गए । सबसे ज्यादा हल्ला तो RPSC में ही हुई नियुक्तियों पर है। ये नियुक्तियां न केवल असंतुष्ट गुट की आंखों की किरकिरी बनी हुई, बल्कि इन्हें लेकर समर्थक कार्यकर्ताओं में भी अंदर खाने में खासा रोष है।

Rajasthan

सबसे बुरा हश्र अग्रिम संगठनों का

कांग्रेस में कभी एनएसयूआई, युवा कांग्रेस, महिला कांग्रेस,सेवादल हरावल दस्ते माने जाते थे। वर्तमान में प्रदेश में कांग्रेस की आंख-कान कहलाने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से लेकर अधिकतर नेता इन्हीं अग्रिम संगठनों की देन हैं, लेकिन जब से एनएसयूआई व युवा कांग्रेस में सीधे चुनाव का जो सिस्टम अपनाया गया हैं तब से ये संगठन नाममात्र के रह गए हैं।

इन संगठनों के चुनाव कैसे होते हैं ये आला नेताओं से छुपा हुआ नहीं हैं पर कोई आवाज़ उठाने वाला नहीं। नए पैटर्न से नए नेतृत्व का संकट खड़ा होता जा रहा हैं। ऐसे में आने वाले समय में पार्टी में युवा कार्यकर्ताओं का टोटा पड़ सकता है। सेवादल का जहां तक सवाल है उसके पास भी कोई ऐसे रचनात्मक कार्यक्रम नहीं। पार्टी के विभिन्न आयोजनों में व्यवस्था बनाए रखने में सेवादल की सफेद ड्रेस व सफेद टोपी जरूर दिखाई दे जाती है।

महिला कांग्रेस भी कुछ छोटे-मोटे आयोजन तक सीमित है। इन चारों अग्रिम संगठन की ये दशा क्यों हुई ? इस पर विचार मंथन का वरिष्ठ नेताओं के पास समय हो तब जाकर इनके अच्छे दिन आए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *