जयपुर। गहलोत समर्थक विधायक व अन्य कार्यकर्ता जहां कहीं भी केन्द्रीय नेताओं से मिले। अपनी गोटी फीट करने तथा टिकट पक्की करने के चक्कर में जो फीडबैक दिया वह उल्टा पड़ गया। पायलट गुट तो पहले से ही आक्रमक था ही पर गहलोत समर्थकों ने भी कम नुकसान नहीं किया। केन्द्रीय नेताओं से जो भी मिला उसने कहा- सीएम साहब ठीक हैं। अच्छा काम कर रहे हैं पर मंत्रियों का कार्य-व्यवहार ठीक नहीं। इसके चलते “हम तो जैसे-तैसे जीत आएंगे पर सरकार फिर से नहीं बन पाएगी”।
क्या है केन्द्रीय नेतृत्व की चिंता
इस फीडबैक ने ही केन्द्रीय नेतृत्व को चिंंता में डाल दिया। आलाकमान को सख्त कदम उठाने तथा आमूलचूल बदलाव की दिशा में सोचने को मजबूर कर दिया। जयपुर-दिल्ली में चली कवायद इसी का परिणाम हैं। इसके चलते ही वर्तमान में कांग्रेस आलाकमान के फोकस पर राजस्थान हैं। समर्थित निर्दलीयों व बसपा से कांग्रेस में आए विधायको की गतिविधियां भी नुकसानदेह साबित हुई। इन सभी कारणो के कारण ही आलाकमान को लगा कि राजस्थान में हालात ठीक नहीं हैं।
सुलह के फार्मूले को लागू करने में जुटा हैँ आलाकमान
जानकार सूत्रों की माने तो कांग्रेस आलाकमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच सुलह का जो फार्मूला खोज रही हैं। उसके पीछे मंतव्य यहीं है कि असंतोष के बादल छंटे। सरकार भी पांच साल चले और आगामी विधानसभा के साथ लोकसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन हो। सभी को संतुष्ठ करने के लिए सत्ता व संगठन में प्रमुख नेताओं को खपाने का रोड मैप तैयार किया गया हैं। इसी रोड मैप को मजबूती से लागू करने की सोच के तहत ही केन्द्रीय नेताओं के एक के बाद एक दौरे राजस्थान में हो रहे हैं।
पायलट को संतुष्ट करना इसलिए हैं जरूरी
सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस में पहले राजनैतिक संकट के लिए पक्ष-विपक्ष के गुट दिल्ली में डेरा डाला करते थे,लेकिन वास्तविक रिपोर्ट सामने आएं इसी सोच के तहत कांग्रेस आलाकमान संतुष्ट-असंतुष्टों से यहां आकर संवाद कर रही हैं। जहां तक सचिन पायलट से किए वादों को पूरा करने का सवाल हैं उसके पीछे भी कांग्रेस आलाकमान का सोच है कि कांग्रेस राजस्थान में मजबूत बने। मध्यप्रदेश जैसी गलती राजस्थान में नहीं दोहराना चाहती। पायलट के पीछे जो बड़ा वोट बैंक है उसे कांग्रेस के साथ बनाएं रखने में पायलट ही सक्षम हैं। स्टार प्रचारक होने के कारण पायलट राष्ट्रीय स्तर पर भी काफी उपयोगी हैंं। ऐेसे में पायलट को बिल्कुल ही दरकिनार नहीं किया जा सकता। कांगेस की इस रार का कहां जाकर अंत होगा इस पर सबकी नजर टिकी हुई हैं।
