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असहमति को दबाने के लिए आतंक विरोधी कानून का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए : जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़

नई दिल्ली : देश में जहां एक तरफ जहां UAPA कानून के दुरुपयोग के खिलाफ लड़ाई तेज हो रही है तो ऐसे समय में कानूनों के गलत इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट के जज, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अहम टिप्पणी सामने आई है। उन्होंने कहा कि नागरिकों की असहमति को दबाने के लिए किसी भी कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। जस्टिस चंद्रचूड़ की यह टिप्पणी भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच कानूनी संबंधों पर एक कार्यक्रम के दौरान सामने आई। उन्होंने कहा कि आपराधिक कानून जिसमें आतंकवाद विरोधी कानून भी शामिल है, का इस्तेमाल नागरिकों के असंतोष या उत्पीड़न को दबाने में नहीं किया जाना चाहिए।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि हमारी अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे नागरिकों को आजादी से वंचित करने के खिलाफ रक्षा की पहली पंक्ति बनी रहें। एक दिन के लिए भी स्वतंत्रता का नुकसान बहुत ज्यादा है। हमें अपने फैसलों में गहरे प्रणालीगत मुद्दों के प्रति हमेशा सचेत रहना चाहिए। भारत और अमेरिका, दुनिया के अलग- अलग कोने में हैं, लेकिन फिर भी एक गहरे सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध साझा करते हैं।

अर्णब गोस्वामी बनाम राज्य के अपने फैसले का जिक्र करते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हमारी कोर्ट्स को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह जनता की रक्षा की कतार में सबसे आगे खड़े रहे ताकि नागरिक स्वतंत्रता से वंचित न रहें। उन्होंने कहा कि एक दिन के लिए भी आजादी का नुकसान बहुत ज्यादा होगा। उनका यह बयान 84 वर्षीय कार्यकर्ता स्टेन स्वामी की मौत पर उपजी नाराजगी के बीच आया है। बताते चलें कि 84 साल के स्टेन स्वामी को UAPA कानून के तहत एल्गर परिषद मामले में गिरफ्तार किया गया था। स्वास्थ्य के आधार पर वह जमानत की लड़ाई लड़ रहे थे कि इसी बीच मुंबई स्थित जेल में उनका निधन हो गया।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि अमेरिका स्वतंत्रता, बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक शांति को बढ़ावा देने में सबसे आगे है। भारत सबसे पुराना और सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते बहुसांस्कृतिक, बहुलवादी समाज के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय संविधान भी मानव अधिकारों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और सम्मान पर केंद्रित हैं। भारतीय न्यायशास्त्र पर अमेरिका के प्रभाव को कम करके नहीं आंका जा सकता है। इसने भारतीय संविधान के दिल और आत्मा में योगदान दिया है। अमेरिकी प्रभाव का ही उदाहरण भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के अधिकार पर है।

 

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