7 साल बनाम 37 साल का झगड़ा, बचे कांग्रेसियों की कौन सुध ले

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जयपुर। राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर कांग्रेस में प्रदेश के दो प्रमुख नेताओं में जो रार चल रही है उसमें एक नेता समर्थक जहां 7 साल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपने नेता का कार्यकाल गिना रहे हैं तो दूसरे खेमे के लोग अपने नेता के साथ 37 वर्षों से पार्टी का झंडा बुलंद रखने का हवाला देते हुए पहला हक अपना मान रहे हैं। इसमें एक खेमा सचिन पायलट का है तो दूसरा राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का।

हक तो बनता ही है

पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के खेमे के सिपहसलारों का तर्क है कि सात साल तक जिन कार्यकर्ताओं ने पायलट के साथ संगठन में काम कर पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया उन्हें सरकार में राजनीतिक पदों पर नवाजे जाने का हक तो बनता है। दूसरा उनके समर्थक विधायकों को मंत्री पद मिले। बराबर की भागीदारी की मांग को लेकर पायलट खेमे से असंतोष के स्वर बार-बार सुनाई भी दे रहे है। इन दिनों गुढ़ामलानी से कांग्रेस विधायक व सचिन पायलट के खास हेमाराम चौधरी विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिए बैठे हैं,हालांकि उनका इस्तीफा अभी मंजूर नहीं हुआ हैं। चाकसू से विधायक वेद प्रकाश सोलंकी भी आरपीएससी में हुई नियुक्तियों को लेकर अपनी ही सरकार को घेर चुके हैं।

37 साल से जुड़े हैं, पहला हक हमारा

दूसरी तरफ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समर्थक तर्क दे रहे है कि वे 37 सालों से गहलोत के साथ जुड़े हुए है और निरंतर पार्टी की सेवा कर रहे हैं। कांग्रेस को उन्होंने भी सींचा है। ऐसे में प्राथमिकता में वे आते हैं। आपको बता दे कि 37 साल पहले गहलोत ने प्रदेश कांग्रेस की पहली बार बागडोर संभाली थी।

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इनको भी बड़ी उम्मीद

इन सबसे इतर वे कांग्रेसजन भी है जो 40 सालों से भी अधिक समय से कांग्रेस का झंडा इस उम्मीद से लहराते घूम रहे है कि कभी तो उन्हें भी सत्ता का सुख भोगने को मिलेगा। कांग्रेस के साधारण कार्यकर्ता की तो टीस संगठन व सत्ता में पद ज्यादा कांग्रेस में पहचान व मान-सम्मान की हैं। ऐसे अनगिनत कार्यकर्ता है जो कहते है कि कम से कम नेता उन्हें कर्मठ कार्यकर्ता होने का अहसास करवाने वाला सम्मान तो दे। बस! भीड़ में उनको नाम से भी पुकार ले और समय-समय पर होने वाले कार्यक्रमों व आयोजनों में याद भर कर ले।

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मंत्रिमंडल विस्तार से भी बढ़ सकती है मुश्किलें

मंत्रिमंडल का विस्तार व फेरबदल का जहां तक सवाल है। यह होने पर भी कलह समाप्त होती नजर नहीं आ रही। हालात यह है कि सत्तारूढ़ दल और समर्थन दे सत्ता के खेमे में बैठा प्रत्येक विधायक मंत्री पद की उम्मीद लगाए बैठा हैं। मंत्रियों के साथ संसदीय सचिव भी बनाए जाएं तो मुश्किल से 15 से 20 विधायकों को खुश किया जा सकता है, हालांकि मन माफिक नियुक्ति नहीं मिली तो इनके भी संतुष्ट रहने की कोई गारंटी नहीं।

किस-किस को करेंं खुश

गहलोत-पायलट गुट के अलावा पहला हक बसपा से कांग्रेस में आने वाले विधायक मांग रहे हैं। सरकार को समर्थन दे रहे निर्दलीय भी मंत्री बनने की आस लगाए बैठे हैं। ऐसे में किस-किस को संतुष्ट करें ये परेशानी कोई छोटी नहीं है।

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बोर्ड-निगमों पर भी विधायकों की नजर

बोर्ड, निगम व आयोगों में नियुक्ति का जहां तक सवाल है इनमें महत्वपूर्ण पदों के साथ यूआईटी(UIT) आदि के अध्यक्ष पदों को जोड़ भी लिया जाए तो 60 से 70 ही खुश किए जा सकते हैं। इन पदों पर भी पहली नजर विधायकों की टिकी हुई है। ये सब पद अगर विधायकों में बांट दिए गए तो आम कांग्रेसी तो किसी पद की सपने में भी नहीं सोच सकते कि उन्हें भी कभी कोई पद मिलेगा।

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तीसरे शासन में भी कुछ ना मिलने का मलाल

मुख्यमंत्री खेमे को ही ले तो कई निष्ठावान कार्यकर्ता तो पिछले दो बार के शासन में कुछ ना मिलने के बावजूद भी समर्पण भाव से अपने नेता के साथ पार्टी संगठन के लिए लगे रहे। उनकी उम्मीदों पर भी पानी फिरता नजर आ रहा है,जबकि ऐसे कई वफादार कार्यकर्ता तो उम्मीदों के बीच ही इस संसार को अलविदा कर गए। कांग्रेस के कई बुजुर्ग नेता जब भी मुख्यमंत्री से मिलने आए तो उन्हें मुख्यमंत्री ने भावुकता दिखाते हुए एक बारगी खुश तो कर दिया,लेकिन उनकी उम्मीदें पूरी हो पाएगी उसका कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा।

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पायलट के समक्ष भी चुनौति कम नहीं

जहां तक सचिन पायलट खेमे का सवाल है वे कांग्रेस शासन आने से पहले ही पद तक बांटे बैठे थे। अब जो वास्तविक परिदृश्य नजर आ रहा है उसमें पायलट भी अपनी कौर टीम में से सभी को पद दिलवा सके नामुमकिन सा लगता हैं। सत्ता से दूर हुए पायलट की एक बड़ी परेशानी यह भी है कि जिन लोगों ने उन्हें बाहर से मजबूती दी वे भी बहुत सी उम्मीदे लगाए बैठे थे। उनके राज के कामकाज हो सके ऐसा तो दूर-दूर तक कोई रास्ता ही नजर नहीं आता। भविष्य में ऐसे लोग कैसे साथ देंगे यह चिंता भी कोई कम नहीं।

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