गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी का इस्तीफा अनायास तों नहीं?

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी का इस्तीफा अनायास तों नहीं?

गांधीनगर: गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी के अनायास इस्तीफा ने सभी को चौका दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जम्बो मंत्रिपरिषद के विस्तार के समय यह अंदेशा था कि कुछ वर्तमान और पूर्व मुख्यमंत्री को इस्तीफ़ा दिलवा कर केन्द्र में लाया जायेगा। लेकिन कतिपय कारणों से उस वक्त कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों की केन्द्रीय मन्त्री के रूप में शपथ हुई लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्रियों को लेकर ऐसा नही हो पाया था।

कतिपय मुख्यमंत्रियों को केन्द्र में मंत्री बना कर लाने के पीछे जो सबसे मज़बूत कारण बताया जा रहा था वह थी आईबी की वह रिपोर्ट्स जो कि अगले वर्ष 2022 में पाँच छह प्रदेशों में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर प्रधानमंत्री के पास पहुंची है। दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके विश्वास पात्र गृह मन्त्री अमित शाह यह भलीभाँति जानते है कि वर्ष 2022-23 में राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा आम चुनाव के पहले के सेमी फाइनल हैं।

इनके चुनाव परिणाम अगले आम चुनाव की दिशा और दशा तय करने वाले होंगे। विशेष कर देश में सबसे अधिक आबादी और लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश एवं मोदी-शाह का अपना गृह प्रदेश के चुनाव परिणाम बहुत बड़ा सन्देश देने वाले रहेंगे। फिर उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ द्वारा पंचायत चुनावों में आशानुरुप प्रदर्शन नही किए जाने के बावजूद हिन्दू वोटों पर बढ़ती उनकी पकड़ और लोकप्रियता के साथ-साथ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पहल पर अगले चुनाव में ग़ैर कांग्रेसी दलों का मुस्लिम पंथी दलों के साथ गठबन्धन किए जाने की संभावना से होने वाले वोटों का ध्रुवीकरण और कांग्रेस के पुनः प्रियंका गांधी के नेतृत्व में आगे आने आदि भाजपा की सबसे बड़ी चिन्ता बताई गई।

बताते है कि अयोध्या में राम मन्दिर का निर्माण और आरएसएस के वीटो के कारण योगीजी,यूपी में सम्भावित बदलाव की चपेट में आने से बच गए वरना वहाँ केशव प्रसाद मौर्या अपनी ताजपोशी की उम्मीद लगायें बैठे थे। इस दरम्यान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी और कुछ और को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में दबी ज़ुबान से चर्चायें हो रही थी। रूपानी को अमित शाह का निकटवर्ती माना जाता है। हालाकि गुजरात में पटेल समुदाय के मुक़ाबले रूपानी की जाति के बमुश्किल एक दो प्रतिशत वोट भी नही है।

आनन्दी बेन को मुख्यमंत्री से हटा कर राज्यपाल बनाते वक्त भी पटेल समुदाय शीर्ष नेतृत्व के फैसले से सकते में था। विशेष कर तब जब गुजरात में भाजपा बहुत कम सीटों के अन्तर से जीत कर पुनःसत्ता पर क़ाबिज़ हुई थी। गुजरात में पटेल समुदाय के वोट भारी संख्या में है और देश विदेश में रहने वाले व्यावसायी पटेल नेताओं को चुनावों में चन्दे के रूप में मोटी राशि भी पहुँचाते है।

गुजरात में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव मोदी-शाह के लिए नाक का सवाल है। वे इस चुनाव को किसी भी क़ीमत पर जीतना चाहेंगे। हालांकि कांग्रेस के पिछलें चुनाव के मुक़ाबले बहुत कमजोर हो जाने और कांग्रेस के चाणक्य अहमद पटेल के इस दुनिया में नही रहने से बीजेपी का गुजरात में चुनाव जीतना मुश्किल नही रह गया हैं फिर भी पार्टी चुनाव में पटेल लौबी को नाराज़ करने का खतरा उठाना नही चाहती है।

इसलिए विजय रूपाणी का इस्तीफा कराया गया है। राजनीतिक जानकार इस बदलाव इस एक ओर बड़ा कारण दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के चुनाव होने वाले राज्यों में सक्रिय होने को भी बताया जाता है। केजरीवाल इन प्रदेशों की सभी सीटों पर अपनी आम आदमी पार्टी (आप) के उम्मीदवारों को चुनाव लड़ा कर अपने मुफ़्त बिजली पानी भोजन आदि ऐजेंडे को आगे बढ़ाने की घोषणा करते जा रहें है। केजरीवाल की पार्टी का यह डर भी सभी दलों के लिए दशहत का कारण बनता जा रहा है।

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