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जब डोटासरा ही सत्ता का मोह नहीं छोड़ पा रहे तो बाकी क्यों माथा खपाए पार्टी में

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जयपुर। कांग्रेस में इन दिनों सत्ता में नियुक्तियों को लेकर जो सियासी पारा चढ़ा हुआ है,वह कुछ सौ लोगों तक की लड़ाई है। कांग्रेस के लिए वर्षो से सड़कों पर संघर्ष कर रहे तथा अपने वोटों से सींच संगठन को जिंदा रखने वाले लाखों लोगों की कोई चिंता करने वाला ही नहींं, सत्ता तो दूर की कौड़ी। संगठन में भी उनकी भागीदारी केवल वोट तक सीमित है।

ये उठा रहे है लाभ

सत्ता व संगठन में जिन नेताओं की चलत होती है उनसे जुड़े समर्थक नेता -कार्यकर्ता छोटा मोटा पद पा जाते है। भले ही उनकी कोई खास भागीदारी पार्टी संगठन में कभी रही हो।

पदाधिकारी तो बन गए पर नजर सत्ता पर

सबसे पहले कांग्रेस संगठन की ही बात करें तो 9 माह पहले सचिन पायलट को हटा गोविंद सिंह डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था। जनवरी में उन्होंने कार्यकारिणी भी बना ली। प्रदेश कार्यकारिणी में पदाधिकारी बनाए गए आधे से ज्यादा नेता अपने पद से ही खुश नहीं। उन्हें तो सत्ता में भागीदारी चाहिए।

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ना ही आलाकमान ने दिखाया साहस

इन पदाधिकारियों की लालसा भी सत्ता में भागीदारी की गलत नहीं , क्योंकि जब स्वयं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा शिक्षा सहित कई महकमों के मंत्री बने बैठे हैं। उन्होंने स्वयं ने न तो एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए मंत्री पद छोड़ आदर्श मिसाल पेश की और ना ही कांग्रेस आलाकमान ने सोशल इंजीनियरिंग से डरते उन्हें एक पद से हटाने का साहस दिखाया।

संगठन हुआ बौना

इसका परिणाम यह हुआ कि प्रदेश सचिव स्तर के पदाधिकारियों से संगठन का काम चलाना पड़ रहा है। दो पदों पर होने के कारण डोटासरा भी मंत्री पद और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की भूमिका का सही रूप से निर्वहन नहीं कर पा रहे। उन्होंने तो राज्यमंत्री पद पर बने रहकर सत्तारूढ़ दल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की गरिमा को ही बौना कर डाला।

कार्यकर्ता किसे परफॉर्मेंस दिखाए

संगठन की तस्वीर को ही देखें तो जिला, ब्लॉक व ग्रासरूट की इकाइयां महत्वपूर्ण होती हैं। ये सब भंग पड़ी हैं। पार्टी संगठन स्तर पर जब कोई कार्यक्रम होता है तो भंग इकाइयों के ही किसी पदाधिकारी को जिम्मा सौंप इतिश्री कर ली जाती है। निचले स्तर पर कार्यकर्ता को अपनी परफॉर्मेंस दिखाने का मौका ही नहीं मिल रहा।

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प्रभारियों के साथ चला गया लेखा-जोखा

इन कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी त्रासदी यह भी है कि केंद्रीय स्तर पर उनके कामकाज का कोई हिसाब किताब ही नहीं। कांग्रेस सत्ता से बाहर थी तो शुरू में गुरुदास कामत राज्य के प्रभारी थे। उसके बाद अविनाश पांडे प्रभारी महामंत्री बने। राज्य में चली असंतुष्ट गतिविधियों के बाद हुई सुलह की भेंट पांडे भी चढ़ गए। नए प्रभारी अजय माकन के कार्यकाल में जिला व ब्लॉक कमेटियां ही नहीं तो आलाकमान के स्तर पर कार्यकर्ता का आंकलन होने का सवाल ही नहीं उठता। ऐसे में मंत्री, विधायक ही संगठन स्तर पर भी सर्वेसर्वा हैं। वे जिसको चाहते हैं या पसंद करते है वो ही राज में नियुक्ति की दौड़ में हैं। असली कार्यकर्ताओं का लेखा-जोखा तो प्रभारियों के साथ ही चला गया। नए प्रभारी ने जिला व ब्लॉक की अभी तक सुध ही नहीं ली।

यूं होता गया संगठन कमजोर

सत्ता में भागीदारी की लालसा में कई कार्यकर्ताओं की तो संगठन में दरी बिछाते-बिछाते उम्र ही गुजर गई। पिछले कुछ वर्षों से तो हालात यह हैं कि जिस दल की सरकार होती है, पार्टी से अधिक सरकार ही सुपर होती है। पार्टी की ताकत कमजोर होने का हश्र यह हुआ कि पार्टियां भी सत्ता पर केंद्रित होकर रह गई।

कार्यकर्ताओं का जमाना लद गया

एक पुराने कांग्रेसी कार्यकर्ता के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री स्व.हरिदेव जोशी के कार्यकाल तक ब्लॉक पदाधिकारी के लेटर पेड पर अनुशंषा को मानते हुए काम होते थे। उसके बाद से यह सिलसिला कांग्रेस विधायक, सांसद, हारे-जीते लोकसभा व विधानसभा प्रत्याशियों तक सिमटकर रह गया। अब तो मंत्री तक के यहां कार्यकर्ता की पहचान ही नहीं तो काम का तो सवाल ही नहीं। ऐसे में अधिकारी कार्यकर्ताओं की क्यों सुनेंगे।

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