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कोरोना:सरकारी दावे कुछ, जमीनी हकीकत अलग

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जयपुर। कोरोना के केस कम आने तथा रिकवर दर अधिक बताने के सरकारी दावों के बीच जमीनी हकीकत यह है कि कोरोना का संक्रमण प्रदेश के गांवों में इस कदर फैला हुआ है कि समय पर जांच व चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में लोग रोज काल के ग्रास बन रहे है। इन मौतों को कोविड में गिना ही नहीं जा रहा। कोरोना ने इस बार राज्य के गांव-गांव में दस्तक दे दी है।

यूं लड़ रहे है ग्रामीण कोरोना से लड़ाई

सरकारी संसाधनों का इंतज़ार किए बिना ग्रामीण विभिन्न संस्था, संगठनों व भामाशाहों की मदद से कोरोना से मुकाबला कर रहे है।

ये है हकीकत

हालात यह है कि तीन दिन पूर्व जो व्यक्ति स्वस्थ घूमता दिखाई दे रहा था अचानक मृत्यु की घटनाओं से लोग अंदर ही अंदर दहल उठे है। 20 से 40 वर्ष के युवाओं के अचानक कोरोना के कारण चले जाने की घटनाएं देखने को मिल रही है। अभी भी लाखों लोग अपने घरों में आईसोलेटेड है।

जांच तो दूर की कौड़ी, सर्वे भी नहीं हो रहा

सरकार सही ढंग से घर-घर सर्वे करवाए तो अकेले जयपुर शहर में चौकन्ने वाला आंकड़ा सामने आ सकता है। गंभीर मरीजों के इलाज और दवा के नाम पर तो खुली लूट का खेल सरकार की सख्ती के बाद भी जारी है। निजी अस्पताल मुख्यमंत्री चिरंजीवी निःशुल्क स्वास्थ्य बीमा योजना को लागू करने को तैयार ही नहीं है, जबकि सरकार कोविड के बाद ब्लैक फंगस को भी इसमें कवर करने की बात कह रही है।

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सीएचसी व पीएचसी का सही सदुपयोग ही नहीं

सरकार के लाख दावों के बावजूद जो भयावह हालात ग्रामीण क्षेत्रों के बने हुए है उसके चलते लोग गांवों की तरफ रुख करने के स्थान पर शहरों में ही टिके हुए हैं।सरकार ने सीएचसी व पीएचसी स्तर पर जो संसाधन जुटाए है। वे ऐसे है कि व्यक्ति उससे अच्छा घर पर रहकर इलाज लेना बेहतर समझता है।

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खाली पड़े है बेड

कोविड केयर सेंटर में भी गांवों में लोग आना भी नहीं चाहते। उदाहरण के तौर पर झुंझुनूं जिले के बिसाऊ कस्बे में जटिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में ऑक्सीजन सहित बीस बेड लगाए गए हैं, लेकिन ये सब खाली पड़े है। यहा 80 से अधिक ऑक्सीजन लेबल वाले को भर्ती करते है इससे कम पर सीधे झुंझुनूं रैफर करते है।

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चिकित्सकों की भी कमी

चिकित्सकों की कमी के चलते मरीजों के परिजन भी इलाज के लिए जयपुर-सीकर किसी निजी अस्पताल का रुख करना ज्यादा पसंद करते है।

वेंटिलेटर की मारामारी

वेंटिलेटर वाले मरीजों की सबसे अधिक परेशानी है। ग्रामीण क्षेत्रों की छोड़ो, वेंटिलेटर शहरों तक के सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं हैं। समय पर वेंटिलेटर मुहैया नहीं होने से लोग दम तोड़ रहे है।

मरीजों की सारसंभाल ही नहीं हो रही

नागौर जिले के कुचामन सिटी में लोगों की पीड़ा यह है कि नर्सिंग व पैरा मेडिकल स्टाफ कोरोना के इलाज के लिए पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं है। संसाधन की कोई कमी नहीं है। इलाज के मामलों में कमोबेश यही स्थिति राज्य के अन्य ग्रामीण क्षेत्रों की है

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