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‘मेरी आवाज़ सुनो’ गाने के बोल से ट्वीट कर गहलोत ने प. नेहरू को दी श्रद्धांजलि

जयपुर: ‘मेरी आवाज़ सुनो’ मोहम्मद रफ़ी के गीत के माध्यम से आज राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Pandit Jawaharlal Nehru) को याद किया। गहलोत ने कहा की स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने के बाद आजाद भारत से आधुनिक भारत की बुनियाद रखने में प्रथम प्रधानमंत्री के तौर पर जवाहरलाल नेहरू की बात करे तो उनकी उपलब्धियों से इतिहास भरा पड़ा है।

गीत के बोले कुछ इस तरह है…

मेरी आवाज़ सुनो, प्यार का राग सुनो
मैंने एक फूल जो सीने पे सजा रखा था
उसके पर्दे में तुम्हें दिल से लगा रखा था
था जुदा सबसे मेरे इश्क का अन्दाज़ सुनो

क्यों सँवारी है ये चन्दन की चिता मेरे लिये
मैं कोई जिस्म नहीं हूँ कि जलाओगे मुझे
राख के साथ बिखर जाऊँगा मैं दुनिया में
तुम जहाँ खाओगे ठोकर वहीं पाओगे मुझे
हर क़दम पर है नए मोड़ का आग़ाज़ सुनो

प. नेहरू को श्रद्धांजलि देते हुए CM गहलोत ने पहली बार कोई फिल्मी गाना ट्विटर पर गुनगुनाया है। ‘नौनिहाल’ फ़िल्म का यह गाना कैफ़ी आज़मी ने लिखा था। इस गीत को फ़िल्म के क्लाइमेक्स में दिखाया गया था, गीत के साथ नेहरू की अंतिम यात्रा के दृश्य भी दिखाए गए हैं। इंदिरा गांधी ने शॉट्स का उपयोग करने के लिए विशेष अनुमति दिलाई थी। इस गीत में चाचा नेहरू की अंतिम इच्छा का मार्मिक वर्णन है। आज CM गहलोत ने अलग अंदाज में नेहरू को श्रद्धांजलि दी।

 

मुख्यमंत्री गहलोत ने एक अन्य ट्वीट में लिखा कि आजाद भारत के सामने अनेक चुनौतियाँ थी। देश को शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार, आधारभूत संरचना, कृषि, उद्योग, सामाजिक उत्थान यानी सभी क्षेत्रों में संरक्षण चाहिए था। पंडित नेहरू ने देश की सभी समस्याओं को एक अवसर में तब्दील किया और आज जो भारत हम देख रहे हैं उसकी बुनियाद भी रखी।

 

उन्होंने कहा की राजस्थान को अतिरिक्त गर्व इस बात का भी है कि भारत में पंचायती राज की स्थापना पंडित नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले में 2 अक्टूबर 1959 को की थी। उनकी पुण्यतिथि पर भारत निर्माण में भागीदारी निभाने की प्रतिबद्धता को हम दोहराते हैं।

एक लेख को शेयर कर कहा नेहरू बहुत याद आते हैं

इसके साथ ही उन्होंने नेहरू जी से संबंधित जय प्रकाश चौकसे का एक लेख भी शेयर किया। जिसके साथ अपने ट्वीट में गहलोत ने कहा ‘आज जहालत, मूर्खता और संकीर्णता के दौर में नेहरू बहुत याद आते हैं। प्रायः लोग गगनचुंबी इमारत को देखते हैं, उसकी बुनियाद रखने वाले को याद नहीं करते। घने बादलों में नेहरू की याद बिजली सी कौंध जाती है।’

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