जन से जुड़ा एक आक्रामक नेता, जाके भय से सब दल कांपे

  • राजनीति का एक अदद चेहरा: हनुमान बेनीवाल
  • लाखों की भीड़ को अकेले दम पर बांधे रखने वाला जादूगर
  • हनुमान नाम ही काफी दूसरे दलों की चिंता बढ़ाने के लिए

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विमलेश शर्मा, जयपुर @

हनुमान की तरह हुंकार भरने वाला व्यक्ति जिसे ना कोई भय और ना ही परिणाम की चिंता। जिससे टकराने की ठानी तो ठान ही ली। चाहे उसके परिणाम कुछ भी निकले। चाहे वह व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली व सामर्थ्यवान क्यों ना हो। राजनीति क्षेत्र में एक ऐसा ही व्यक्तित्व हैं हनुमान बेनीवाल। आरएलपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल चिरंजीवी हनुमान तो नहीं, लेकिन नटखट स्वभाव ऐसा जो उन्हें औरों से अलग बनाता हैं। जब तक जिसके साथ रहे उसका खुलकर साथ दिया और जब कदम वापस खींचे तो फिर चाहे वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही क्यों ना हो। बेनीवाल की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से अदावत तो जगजाहिर है ही।

जाट राजनीति और बेनीवाल

राजस्थान में जाट राजनीति का अपना महत्व है। राज्य विधानसभा की अस्सी से अधिक सीटों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव डालने वाले इस जाति वर्ग में कभी नाथूराम मिर्धा, चौधरी कुम्भाराम, परसराम मदेरणा, शीशराम ओला सरीखे अनेक नेता थे जिनकी तूती बोलती थी। राजस्थान में तो अब कांग्रेस-भाजपा दोंनों में ही ऐसा कोई दमदार चेहरा नजर नहीं आता। वर्तमान में अकेले आरएलपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हनुमान बेनीवाल ही है जिनकी आवाज दूर तलक सुनी जाती है और उनके एक बुलावे पर युवा चार सौ से पांच सौ किलोमीटर सुदूर क्षेत्रों से भी दौड़े चले आते हैं। जाट राजनीति मेंं तो आज की तिथि में हनुमान बेनीवाल से बड़ा कोई नेता नहीं जो लाखोंं लोगों का चहेता हो। लाखों की भीड़ इकट्ठा करना उन्हें आता है तभी तो वे शक्ति प्रदर्शन के तौर पर प्रदेश के पांच अलग-अलग स्थानों पर हुंकार रैली आयोजन में सफल हो पाए।

सभी समाजों को साधने की कोशिश

हनुमान ने जब से अलग राजनीतिक दल गठित किया है तब से अन्य समाज को भी साधने की वे पूरी कोशिश में है तथा उसमें कुछ हद तक वे सफल भी रहे हैं। हार-जीत में निर्णायक भूमिका में जहां जाट है उन सुरक्षित सीटों पर उन्हें कामयाबी भी मिली हैं। राज्य विधानसभा में आरएलपी के तीन सदस्यों में से दो अजा वर्ग से ही आते हैं।

बेनीवाल साथ होते तो परिणाम ही कुछ और होते

हाल में सम्पन्न तीन उपचुनावों को ही ले तो बेनीवाल की पार्टी से सुजानगढ़ सुरक्षित सीट से उम्मीदवार ने 32 हजार से अधिक मत प्राप्त किए। इस उपचुनाव में बेनीवाल ने भाजपा को नाकों चने चबा दिए, जबकि इस सीट पर भाजपा-कांग्रेस की तो पूरी टीम तैनात थी। दूसरा गहलोत सरकार में मंत्री रहते हुए मास्टर भंवरलाल मेघवाल के निधन के कारण हुए इस उपचुनाव में मेघवाल के बेटे मनोज मेघवाल के पक्ष में सहानुभूति लहर भी थी। तीनों ही दलों के मिले वोट बताते हैं कि भाजपा से अलग होकर बेनीवाल की पार्टी चुनाव नहीं लड़ती तो परिणाम भाजपा के पक्ष में जा सकते थे।

कम समय में करवाया उपस्थिति का अहसास

बेनीवाल केवल जाट नेता का मिथक तोड़ सब जाति-वर्गों की थोड़ी-थोड़ी सहानुभूति चाहते है ताकि उनका दल तीसरे दल के रूप में उभर सके। हालांकि 2018 के विधानसभा चुनावो में तो ऐनवक्त पर उन्होंंने भाजपा-कांग्रेस से टिकट कट जाने वालों को ही भाग्य आजमाने के लिए उतारा था उसके बावजूद आरएलपी ने इतने कम समय में अपना वजूद कायम करके दिखा दिया। लोकसभा चुनावों में भी माना जाता है कि चार से पांच सीटों पर हनुमान बेनीवाल से समझौते का लाभ भाजपा को मिला उसमें जोधपुर सीट प्रमुख है जहां से केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत चुनाव जीते और उन्होंने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सुपुत्र को पराजित किया।

पूरा परिवार ही जुझारू

राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हनुमान बेनीवाल को यूं तो राजनीति विरासत में मिली,लेकिन उन्होंने अपने संघर्ष से ऊंचा मुकाम हासिल किया। पिता रामदेव चौधरी(बेनीवाल) भी जुझारू नेता थे। वे नागौर जिले की मुंडवा विधानसभा सीट से 1977 की जनता लहर फिर 1985 में दो बार विधायक रहे। उनका चुनावों के बीच में ही 1998 में निधन हो गया। उस चुनाव में देरी से सिम्बल जारी होने के कारण हनुमान चुनाव नहीं लड़ सके।

हनुमान ने 2003 में लोकदल से चुनाव लड़ा और त्रिकोणीय संघर्ष में पराजित हो गए। परिसीमन के बाद हुए 2008 के चुनावों में खींवसर से भाजपा टिकट पर पहली बार विधानसभा पहुंचे, पर उनका भाजपा से थोड़े दिनों में ही मोहभंग हो गया और वे बागी बन गए। बेनीवाल 2013 में अपने दमखम पर निर्दलीय विधायक के रूप में विधानसभा पहुंचे। हनुमान ने 2018 के विधानसभा चुनाव से पूर्व अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का गठन कर लिया और उसके टिकट पर पहले विधानसभा फिर लोकसभा पहुंचे। खाली हुई सीट से अपने भाई नारायण को जीतवाकर विधानसभा में भेजा। बेनीवाल की मां भी उनके अपने पैतृक गांव बरण की सरपंच रह चूकी हैं।

ऐसे चमके जाट नेता के रूप में बेनीवाल

करीब 17-18 साल पहले जोधपुर में एक सभा हो रही थी। उस समय राजस्थान में बीजेपी के पास कोई बड़ा जाट चेहरा नहीं था तो दिल्ली से जाट नेता के रूप में साहब सिंह वर्मा को बुलाया गया, लेकिन वर्मा समय पर सभा नहीं पहुंच पाए तो भीड़ छंटने लगी और ऐसा कोई वक्ता नहीं था जो भीड़ को बांध सके। इतने में राजस्थान यूनिवर्सिटी का एक छात्र नेता मंच पर पहुंचा और उसने अपने भाषण से ऐसी समां बांधी कि लोग हनुमान बेनीवाल के कायल हो गए। इस सभा में अपनी भाषण शैली से बेनीवाल इतने लोकप्रिय हो गए कि आज तक कोई सियासी पार्टीं तोड़ नहीं निकाल पाई।

अपनों के लिए लड़ना सबसे बड़ी ताकत

हनुमान में अपनों के लिए लडऩे का तो शुरू से ही ऐसा मादा रहा है कि वे अपनों के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उनका ये लड़ाकूपन और आक्रमक भाषण शैली ही बेनीवाल की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने राज्य विधानसभा चुनाव 2018 में आरएलपी के बैनर तले शानदार प्रदर्शन कर ताकत का अहसाास करवा दिया था, तभी 2019 में हुए लोकसभा चुनाव के समय भाजपा व कांग्रेस दोनों को समझौते की टेबल पर ला खड़ा कर दिया था। राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह उन्हें भाजपा के साथ ले जाने में सफल रहे। शाह ने उस समय पार्टी के प्रदेश नेताओं के जबरदस्त विरोध की भी परवाह नहीं की थी। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखे तो सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व अमित शाह के स्तर पर समझौता वार्ता होना ही मायने रखता है।

किसान आंदोलन के कारण टूटा भाजपा से नाता

बेनीवाल ने कुछ समय पूर्व किसान आंदोलन के दौरान ही भाजपा से नाता तोड़ा हैं। पहले वे भाजपा के सहयोगी दलों में से ही एक थे। लोकसभा चुनाव में तो भाजपा ने उनके प्रभाव को देखते हुए ही नागौर संसदीय सीट छोड़ी थी। नागौर से लोकसभा चुनाव में उनकी जीत ने नागौर की राजनीति में लम्बे समय तक काबिज रहे मिर्धा बंधुओं के गढ़ को पूरी तरह से ध्वस्त कर डाला। मिर्धाओं के नागौर के स्थान पर अब बेनीवाल वाला नागौर लोग बोलने लग गए। ये कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।

कर्म योद्धा

प्रतिष्ठित मैगजीन फेम इंडिया ने देश के सर्वश्रेष्ठ 25 सांसदों में से हनुमान बेनीवाल को कर्म योद्धा सांसद की श्रेणी में चुना।

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लोकसभा सदस्य के रूप में हनुमान बेनीवाल राजस्थान के 25 सांसदों में से सबसे अधिक मुद्दे उठाने वाले सांसद हैं। उन्होंने खुद के संसदीय क्षेत्र नागौर सहित देश के ज्वलंत मुद्दों को प्रभावी ढंग से लोकसभा में रखा। बेनीवाल ने लोकसभा में अपने 2 वर्षों के कार्यकाल में 101 बार बहस में भाग लिया। राजस्थान विधानसभा में भी वह सबसे अधिक प्रश्न लगाने वाले नेता तथा सबसे अधिक मुद्दे उठाने वाले विधायकों में गिने जाते थे।

बेनीवाल का बढ़ता कद, अन्य दलों की चिंता

बेनीवाल के बढ़ते जनाधार ने 2023 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा व कांग्रेस जैसे दलों को अभी से चिंतन को मजबूर कर डाला है। बेनीवाल की यहीं रफ्तार और युवाओं में आकर्षण बरकरार रहा तो वे किसी के भी बहुमत के आंकड़े को बिगाड़ सकते हैं।

शेखावत से था पारिवारिक जुड़ाव, पिता के आज्ञाकारी

नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल की भाजपा से निकटता का मुख्य कारण पूर्व उप राष्ट्रपति स्व.भैंरोसिंह शेखावत से उनके पिता की घनिष्ठता थी। कांग्रेस ने हनुमान बेनीवाल को एनएसयूआई  का प्रदेशााध्यक्ष बनाने तक का ऑफर दिया था,लेकिन वे पिता के कहने पर कांग्रेस में नहीं गए। शेखावत से पारिवारिक निकटता का ही तकाजा था कि जब हनुमान ने जेल में आमरण अनशन किया था, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत ने तीन मंत्रियों सांवरलाल जाट श्रीकिशन सोनगरा, भंवरसिंह डांगावास तथा बेनीवाल के पिता रामदेवजी को भेजा था तो पिता के आग्रह को स्वीकार करते हुए बेनीवाल ने न केवल अनशन तोड़ा बल्कि छात्र आंदोलन ही वापस ले लिया। उस समय छात्र आंदोलन पूरे राज्य में फैल चुका था।

हनुमान के ‘सारथी’ नारायण

छात्र राजनीति से ही हनुमान के छोटे भाई नारायण सारे कार्यक्रमों का सलीके से आयोजन करवाते रहे हैं। नारायण को इसीलिए हनुमान का सारथी कहा जाता है। उपचुनाव में टिकट की चर्चा चली तो हनुमान की पत्नी कनिका सिंह का नाम भी आया, लेकिन हनुमान ने नारायण को ही उत्तराधिकारी के रूप में विधानसभा में भेजा।

बच्चों के प्रिय पापा

सुपुत्र आशुतोष और सुपुत्री दीया सिंह के जन्मदिन की वायरल हुई फोटो सें बेनीवाल का बच्चों के प्रति स्नेह साफ झलकता हैं। जीवन संगनी के रूप में कनिका बेनीवाल की भूमिका किसी से छुपी नहीं हैं। खेल में क्रिकेट के शौकिन बेनीवाल विश्वविद्यालय के जमाने में कभी-कभी मैदान में हाथ आजमाते दिखाई दे जाते थे। बेनीवाल विधायक के रूप में मैत्री मैचों में खेलते रहे हैं। खाना कभी अकेले नहीं खाते चाहे रात्रि के दो-तीन क्यों ना बज जाए। मिल बैठकर खाना शुरू से ही उनकी आदत में शूमार हैंं।

वीर तेजाजी के भक्त

राजनीति से इतर की बात करें तो हनुमान बेनीवाल को नजदीक से नहीं जानने वाले भले ही सुनी सुनाई बातों के आधार पर उनकी अलग ही छवि चित्रित करते हो, लेकिन वीर तेजाजी भक्त हनुमान बड़े ही धार्मिक प्रवृति के इंसान हैं। उनकी गाड़ी में तेजाजी के भजन ही बजते आपको सुनाई देंगे। बेनीवाल रामस्नेही सम्प्रदाय की रेण पीठ के हाल ही ब्रह्मलीन संत आचार्य हरिनारायण महाराज के भी अनन्य भक्त थे।

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